-डॉ नीलिमा रंजन
ये ग्रीष्म है कि पावस,
क्यों है बेमौसम रिमझिम
और रिमझिम में शिशिर सा कंपन-
उफ़ ये अचानक बदलती मौसम:
फिर मास दो मास जुलाई अगस्त सूखे से
हम राह तकते फुहारों की, कि भीगे तन मन
तृप्त हो तृषित धरा-
किंतु बीती जाती रीती बरखा ऋतु
अथवा हाहाकार अतिवृष्टि का।
ऋतुओं की इस हेराफेरी में
बदलती समय सारिणी से
क्षुब्ध-व्याकुल मानव, बेकल पंछी
छटपटाता पशुधन और आहत पर्यावरण!!
किंतु हमें क्या?
हम तो प्रसन्न हैं गगनचुंबी अट्टालिकाएँ बनाने में
हमें क्या व्याधियों के पसरते जाने से
वृक्षों की गणना कम होते जाने से
हमें क्या?
हम तो मस्त हैं नित नव उद्योगों की गणना वृद्धि में
प्रकृति का निरादर कर विश्व अग्रणी उद्योग नायक बनने में
मेट्रो, बी आर टी एस निर्माण करने में।
हमें क्या?
हम तो इठला रहे वृक्षों को काट कृत्रिम घास बिछाने में
प्रकृति प्रदत्त पुष्प पत्रों को बुहार
कृत्रिम पुष्पों को सजाने में
यूँ ही तो हैं हम स्वयं पर मोहित।
प्रकृति सिसकती कराहती सहती
प्रदूषण पैर पसारता
तो अब तो चेतो मानव
दो विराम संपदा दोहन को।
फिर एक मन की बात,
पर्यावरण संरक्षण की बात
कम होती जाती तितलियों की बात
क्योंकि मुझे पसंद हैं तितलियाँ
मुझे बहुत अच्छी लगती हैं तितलियाँ
उजास भरे पंखों वाली
पीली, नीली, हरी, सजीली
उल्लास की पवन सी बहती
इंद्रधनुषी तितलियाँ
मैं इन्हें पकड़ूँगी नहीं
आबद्ध नहीं करूँगी
मैं बनाऊँगी क्यारियाँ अपने आँगन में
रोपूँगी बीज रंगबिरंगे कुसुमों के
फिर!
पुष्पित पुष्पों का रसपान करने
आएँगी वे स्वयं ही मेरे पास-तितलियाँ
और हम पाएँगे
विहँसती, लहराती, सुगंधित प्रकृति।

साहित्यकार

