— जगदीश चंद्र
वृक्ष महत्व की विस्तार से व्याख्या और इन वृक्षों द्वारा हमें मिलने वाली प्राणवायु (ऑक्सीजन) और अन्य लाभों के बारे में विस्तार से समझते हैं। यह श्लोक केवल पेड़ लगाने का निर्देश नहीं देता, बल्कि यह एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की रचना करने का संदेश देता है:
अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं
न्यग्रोधमेकं दश चिञ्चिणीकान्।
कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयं च
पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा नरकं न पश्येत्॥
शब्दार्थ और व्याख्याः
1. अश्वत्थमेकम् (एक अश्वत्थ – पीपल): व्याख्याः पीपल को भारतीय संस्कृति में सबसे पवित्र वृक्ष माना गया है। यह ‘ब्रह्मा’ का प्रतीक है। यह वृक्ष चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देने वाला होता है, जो इसे अद्वितीय बनाता है। धार्मिक दृष्टि से यह त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतिनिधित्व करता है और इसकी पूजा का विशेष महत्व है। यह आध्यात्मिक चेतना और ज्ञान का प्रतीक भी है।
2. पिचुमन्दमेकम् (एक पिचुमन्द – नीम): व्याख्याः नीम को ‘सर्व रोग निवारिणी’ कहा जाता है। यह औषधीय गुणों का खजाना है। यह वायुमंडल को शुद्ध करता है और कीटाणुओं को नष्ट करता है। आयुर्वेद में नीम के हर भाग (पत्ती, छाल, फल, जड़) का उपयोग किया जाता है। यह स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता का प्रतीक है।
3. न्यग्रोधमेकम् (एक न्यग्रोध – वट/बरगद): व्याख्याः बरगद को ‘विश्व वृक्ष’ या ‘क्षीर वृक्ष’ कहा जाता है। यह अमरत्व और अटलता का प्रतीक है। इसकी विशाल छाया और लंबी जीवन अवधि इसे एक अनमोल वृक्ष बनाती है। यह पारिस्थितिकी तंत्र को स्थिरता प्रदान करता है और अनेक जीवों को आश्रय देता है। पीपल की तरह यह भी रात में ऑक्सीजन देने वाला महत्वपूर्ण वृक्ष है।

4. दश चिञ्चिणीकान् (दस चिञ्चिणीका – इमली): व्याख्याः इमली का वृक्ष स्वाद और पोषण का प्रतीक है। इसके फल खट्टे-मीठे होते हैं, जिनका उपयोग खाने का स्वाद बढ़ाने और आयुर्वेदिक दवाइयों में किया जाता है। दस इमली के पेड़ लगाने का निर्देश बताता है कि यह वृक्ष पर्यावरण और मानव जीवन के लिए कितना उपयोगी है। यह घना और फैला हुआ होता है, जो अच्छी छाया भी प्रदान करता है।
5. कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयं (तीन कपित्थ, तीन बिल्व और तीन आँवला): – कपित्थ (कैंथ/वुड एप्पल): यह वृक्ष सहनशक्ति और औषधीय महत्व का प्रतीक है। इसके फल पेट के रोगों में लाभकारी होते हैं और छाल तथा पत्तियाँ भी काम आती हैं। – बिल्व (बेल): यह वृक्ष भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इसके पत्ते त्रिदेवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। औषधीय दृष्टि से इसके फल पाचन के लिए अमृत समान हैं और यह कई रोगों का नाश करता है। यह आस्था और स्वास्थ्य का संगम है। – आमलक (आँवला): यह वृक्ष ‘धात्री’ (धरती की धाय) कहलाता है। यह विटामिन सी का सबसे समृद्ध प्राकृतिक स्रोत है। यह रसायन (कायाकल्प) की दृष्टि से सर्वोपरि है। यह स्वास्थ्य, दीर्घायु और पोषण का प्रतीक है। – तीन-तीन की संख्याः इन तीनों वृक्षों के लिए ‘त्रय’ शब्द का प्रयोग और तीन-तीन की संख्या संभवतः इनके औषधीय महत्व की अधिकता को दर्शाती है, या फिर इनके द्वारा तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने की क्षमता की ओर संकेत करती है।
6. पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा (पाँच आम के वृक्ष): व्याख्याः आम का वृक्ष ‘कल्पवृक्ष’ की तरह है। इसकी छाया, लकड़ी, पत्ते (पत्तोर) और सबसे बढ़कर इसका मीठा फल — सभी काम के हैं। यह समृद्धि, सौंदर्य और जीवन के आनंद का प्रतीक है। पाँच आम लगाने का निर्देश इसके मीठे फल और छाया के महत्व को रेखांकित करता है।
वृक्षों द्वारा छोड़ी जाने वाली प्राण वायु (ऑक्सीजन) और अन्य लाभ — यह श्लोक पर्यावरण संतुलन का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। ये सभी वृक्ष बड़े, घने और लंबे जीवन वाले हैं, जो निम्नलिखित रूप से प्राणवायु प्रदान करते हैंः


1. प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) और ऑक्सीजन उत्सर्जनः ये सभी वृक्ष प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन (O₂) बाहर छोड़ते हैं। एक परिपक्व वृक्ष औसतन एक वर्ष में सैकड़ों किलोग्राम CO₂ अवशोषित कर सकता है और सैकड़ों लीटर ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकता है, जो एक परिवार के लिए पर्याप्त है।
अश्वत्थ (पीपल) और न्यग्रोध (बरगद) को ‘क्रैसुलेसियन एसिड मेटाबॉलिज्म’ (CAM) प्रकार का पौधा माना जाता है। सामान्य पौधों के विपरीत, ये रात में भी ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं, क्योंकि इनके रंध्र रात में खुलते हैं। यही कारण है कि इन्हें विशेष रूप से पवित्र और लाभकारी माना गया है।
2. वायु शोधन (Air Purification): ये वृक्ष न केवल ऑक्सीजन देते हैं बल्कि वायु में मौजूद हानिकारक गैसों (जैसे सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड) और धूल के कणों को भी अपनी पत्तियों और छाल पर सोख लेते हैं। नीम (पिचुमन्द) तो विशेष रूप से वायु को शुद्ध करने और कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है।
3. भू-जल संरक्षण और जलवायु नियंत्रणः ये विशाल वृक्ष वर्षा जल को रोककर भूमि में घुसने में मदद करते हैं, जिससे भू-जल स्तर बढ़ता है। इनकी छाया से जमीन का तापमान कम रहता है, जिससे आसपास का वातावरण ठंडा रहता है और स्थानीय जलवायु पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ये वृक्ष वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) के माध्यम से जलवाष्प छोड़ते हैं, जिससे वायु में नमी बनी रहती है।
4. जैव विविधता का संरक्षणः ये सभी देशी वृक्ष हैं अतः पक्षियों, कीट-पतंगों, गिलहरियों और अन्य जीवों को आश्रय और भोजन प्रदान करते हैं। इमली, बरगद, पीपल जैसे वृक्ष तो पक्षियों के बसेरों के लिए प्रसिद्ध हैं। इनके फूलों से मधुमक्खियाँ शहद बनाती हैं, जिससे परागण की क्रिया भी होती है।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि सच्चा पुण्य केवल मंदिरों में पूजा-अर्चना से नहीं, बल्कि धरती माता की सेवा से भी मिलता है। वृक्ष लगाना एक ऐसा कर्म है, जो न केवल हमें, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी जीवनदायिनी ऑक्सीजन, शुद्ध वातावरण, भोजन और छाया प्रदान करता है। ‘नरकं न पश्येत्’ (नरक नहीं देखता) का भाव यही है कि जो व्यक्ति इतना महान कार्य कर देता है, उसके लिए किसी भी प्रकार के दुःख या कष्ट की संभावना नहीं रह जाती, क्योंकि उसने मानवता और सृष्टि के लिए सबसे बड़ा योगदान दिया है।
बात वर्ष 1999-2000 के मध्य की है जब मैं निदेशक वन विहार भोपाल के रूप में पदस्थ था, तब स्वमेव प्रेरित होकर बिना किसी बजट प्रावधान के वन विहार, भोजपुर बड़े तालाब के किनारे निम्न प्रजातियों के पौधे लगाये थे जो संख्या में लगभग 50-55 थेः पीपल, बरगद, गूलर, उमर, इमली, बेल आदि।
आज स्थिति यह है कि, इन सभी जीवित वृक्षों के तने की कमर गोलाई (Brest height), तीन आदमी भी घेरे में नहीं ले सकते।
आज कोई भी पर्यटक अथवा भ्रमणकर्ता इन वृक्षों को बड़े तालाब के किनारे वन विहार में कभी देख कर इनकी छाया में शांति के कुछ पल व्यतीत कर सकते हैं।

लेखक: से.नि. आई.एफ.एस.
अधिकारी रह चुके हैं,
वर्तमान में सम्पादक “मी एण्ड माय अर्थ” हैं

