— अनुपम सक्सेना
इन्सान पेड़ से बन तो गया आदमी,
पर जड़ से कटते ही वो आदमी,
अपने पूर्वज पेड़ का दुश्मन हो गया,
जड़ें अपनी काट कर मुक्त पांव से,
सीखा था चलना जब आदमी ने,
तब उसने अपने पहले कदम तले,
कुचला था किसी मासूम पेड़ को,
और तब से आज तक ये आदमी,
तथाकथित रूप से विकसित होता गया,
पेड़ों की लाशों पर आगे बढ़ता गया,
घायल पेड़ों का लहू हरा बहते बहते,
जंगल पर आदमी की क्रूरता सहते सहते,
सागर के सीने से उगता बादल थम गया,
धरती का दामन प्यासा प्यासा ही रह गया,
हरे लहू का प्यासा ये ज़ालिम आदमी,
नदियों की मांग लाल लहू से भर रहा,
अब ये केवल जड़ें ही नहीं काटता पेड़ की,
आदमी को भी तराशता है बड़े करीने से,
जड़ें अपनी जमाने की कोशिश में,
रास्ते में आए पेड़ जंगल और आदमी को,
विकास के नाम पर ये निगलता गया,
धरती को और बंजर कर बढ़ता गया,
अब देखिए चारों ओर क्या सुंदर समा है,
एक भी फूल पौधे का बाकी नहीं निशां है,
कहीं भूल से भी एक पत्ता नहीं खड़कता,
हरियाली पर प्रतिबंध है पूर्ण रूप से,
अधखिली किसी कली पर भंवरा नहीं मचलता,
यह केवल ईंट चूने पत्थर का नगर बन गया,
ज़रा देखो तो सही, आदमी कितना आगे बढ़ गया।


