— पुनीत चतुर्वेदी
जल प्रदूषण के मामले में विश्व में भारत 120वें नंबर पर है, 123 देशों में। अधिक बिजली की खपत और स्टाफ की कमी के कारण एस.टी.पी. काम नहीं कर रहे हैं, जिसके कारण अनट्रीटेड सीवेज सीधे नदियों में जा रहे हैं। यही कारण है कि भारत में हमारी लाइफलाइन कहीं जाने वाली गंगा नदी, यमुना नदी, नर्मदा नदी और छोटी नदियों का तो कहना ही क्या — सभी इस समय प्रदूषण का दंश झेल रही हैं। कुछ जगहों पर तो ऑक्सीजन की मात्रा पानी में इतनी कम हो गई है कि जहां जलीय जीवन लगभग समाप्ति की ओर है। यह अत्यधिक चिंता का विषय है।






कंट्रोल्ड एरिएशन सिस्टम द्वारा नैनो बबल या माइक्रो बबल के माध्यम से पानी में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाकर उसमें सुधार किया जा सकता है। जो काम एस.टी.पी. अधिक बिजली खर्च और अत्यधिक निर्माण कार्य लागत के कारण फेल हो जाते हैं, वहां पर यह तकनीक कम कर सकती है और बेहतरीन नतीजे दे सकती है। हाल ही में उज्जैन के क्षीर सागर में पर्यावरणविद पुनीत चतुर्वेदी ने प्रस्ताव दिया कि एक कंपनी के साथ वहां पर इस तकनीक का प्रयोग करके देखा जाए। वहां पर क्षीर सागर कुंड में नियंत्रित ऑक्सीजन की नैनो, माइक्रो बबल तकनीक का प्रयोग किया गया एवं नैनो बबल तैयार कर क्षीर सागर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ा दी गई। आज क्षीर सागर कुंड उज्जैन का एकमात्र कुंड है जहां ऑक्सीजन की मात्रा पर्यावरण नियमों के अनुकूल है और पानी भी स्वच्छ है।
दिनांक 19 अप्रैल ’26 को उज्जैन के कलेक्टर रोशन सिंह जी एवं नगर निगम आयुक्त श्री अभिलाष मिश्रा जी ने स्विच ऑन कर मशीन का शुभारंभ किया। पर्यावरणविद पुनीत चतुर्वेदी एवं एसपीएस रंधावा ने उक्त कार्य को अंजाम दिया है। मध्य प्रदेश में यह नवाचार के रूप में देखा जाना चाहिए। यह पहला प्रयोग है और सफल भी।

क्षीर सागर जब इस मशीन के आरंभ होने से पहले जांचा गया, तब वह पूरी तरह से काई से भरा हुआ था, पानी का रंग गाढ़ा हरा था, पानी में काफी बदबू आ रही थी, पानी के भीतर कुछ भी देखना मुमकिन नहीं था। मछलियां तो दिखाई ही नहीं दे रही थीं, इकोसिस्टम पूर्ण तया बिगड़ा हुआ था। पानी में इकोसिस्टम को बनाए रखने के लिए घुलित ऑक्सीजन की मात्रा 6 से अधिक होना चाहिए। जैसे ही पानी में नियंत्रित एरिएशन सिस्टम के माध्यम से माइक्रो और नैनो बबल के साथ ऑक्सीजन पानी में घुली, वैसे ही पानी की बदबू भी समाप्त हुई। पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा 6 से अधिक होने पर ही मछलियां प्रजनन करती हैं। वहीं मछलियों में प्रजनन के कारण उनकी तादाद भी लाखों की संख्या में हो गई। छोटी-छोटी कई मछलियां नग्न आंखों से देखी जा सकती थीं, जो कि एल्गी या काई को खा रही थीं। यह इसकी सफलता थी।
इसके कारण पानी में दो से ढाई फीट तक की गहराई तक दिखाई देने लगा और पानी भी शुद्ध होने लगा।
मछलियों की संख्या बढ़ जाने से वहां मछलियों को खाने वाले पक्षी भी दिखाई देने लगे, जो अलग-अलग प्रजातियों के थे और करीब 7 से 8 की संख्या में थे, जो क्षीर सागर पर इसके पूर्व दिखाई नहीं देते थे। ड्रैगनफ्लाई, जो वहां पर पहले दिखाई नहीं दे रही थी, जिसे हम सामान्य भाषा में “हेलीकॉप्टर” बोलते हैं, वह भी सैकड़ों की तादाद में अब दिखाई देने लगी है। ड्रैगनफ्लाई की खासियत यही है कि वह अपने अंडे साफ पानी में देती है। आसपास के लोगों ने स्वयं बताया कि हम लोगों ने यहां पर कभी कछुए नहीं देखे हैं, जो आज कम से कम 7 से 8 की संख्या में पानी के भीतर दिखाई दे रहे हैं।
आज क्षीरसागर का जल शुद्ध है, बदबू खत्म हो चुकी है, पानी में आज ऑक्सीजन की मात्रा 8 से ऊपर है जो बहुत ही अच्छा माना जा सकता है, पानी में 3 फीट की गहराई तक आप आंखों से देख सकते हैं, और यह पूरा कार्य रिकॉर्ड 45 से 50 दिनों के भीतर पूर्ण किया गया। यह नई तकनीक भविष्य में प्रदेश और देश के लिए पानी को शुद्ध करने में कारगर साबित होगी।

बॉक्सः पर्यावरणविद पुनीत चतुर्वेदी ने आम जनता और हमारे धर्मगुरुओं से विनम्र प्रार्थना की है, कि वह नदियों में या कुंड में किसी भी तरह की फूल, पत्तियां, दूध, घी, दही जैसी चीजों को ना डालें या उनका विसर्जन न करें। यह जलीय जीव जंतुओं के लिए जानलेवा होती हैं। जलीय जीव जंतु भी हमारे इको सिस्टम का महत्वपूर्ण अंग हैं। यदि हमें शुद्ध पानी चाहिए तो उसके लिए पानी में जीवित जीव जंतुओं का होना बहुत जरूरी है।

लेखकः
एक्सट्रीम एडवेंचर के संचालक एवं वाग्मी मैगजीन के संपादक हैं

