-वंदना अतुल जोशी
मेरे घर के आँगन में लगा था एक आम का पेड़,
हरा-भरा ऊँचा, सुंदर प्यारा सा।
आत्म विश्वास से ऊपर सिर किए लगे बहुत न्यारा सा।
हम बच्चों का खेलना, झूला झूलना
उसके साथ ही होता,
वह इतना अधिक इतराता,
प्रसन्नता से कैरियाँ गिराता।
कैरी का पना गर्मी में मीठे बोल सी ठंडक दे जाता,
हमारी खुशी में वह शामिल हो जाता।
घर के बहुत से काम इसके तले होते,
गुड्डे-गाड़ियाँ का ब्याह, माँ का बीनना चुनना।
दादी की पापड़-बड़ियाँ इसके नीचे बनती,
दादा के अखबार पढ़ने का गवाह यह होता।
पर्व-त्योहारों पर आम-पत्तों से बनते सुंदर तोरण,
सूखी लकड़ियों से हो जाता हवन।
दिवाली पर आम्रपर्ण नारियल संग इतराता,
भगवान की माला के बीच वह स्थान जो पाता।
जब झुक जाए मेरी कद-काठी,
बेटा-बेटी न दे साथ,
तब तुम बनना मेरे बुढ़ापे की लाठी।
अब कटने लगे है जंगल पेड़ होने लगे कम,
आम के पेड़ को भी खा गया कमरा,
उस पर कुल्हाड़ी चलते ही फट गई मेरी छाती,
प्लास्टिक के तोरण से सजा देते है घर-द्वार।
सौंधापन, आत्मीयता, अपनापन नजर नहीं आता,
कृत्रिमता, छलावे, दिखावे से बन गया मनुज का नाता।
पेड़ लगाओ, लगवाओ, पालने की जिम्मेदारी उठाओ,
हरियाली के साथ शुद्ध हवा मुफ्त में पाओ।

साहित्यकार

