–नीता श्रीवास्तव श्रद्धा
पृथ्वी बनी जीवन आधार
निखरा इसका सौंदर्य अपार।
हरियाली की चूनर ओढ़े,
देती पृथ्वी हमको उपहार॥
नदियाँ गातीं कल कल गान
पर्वत में गूँजे मौन का राग।
कानन की छाया में पलता
कुसुमित जीवन का अनुराग॥
कण-कण धरा में प्राण बसे
हर बूँद यहाँ जीवन है बुनती।
धूल में भी सजीव प्रेरणा,
सांसों में कविता गुनती।।
पंचतत्वों से अलंकृत धरती
नए नए आयाम है गढ़ती।
सांसों में यह प्राणी के
प्राणों के मानिंद ,सदा धड़कती।
पादप जीव पक्षी और जलचर से
सजता है श्रृंगार अवनि का
जीवन की इस श्रृंखला से ही
जीवित है अस्तित्व धरा का ॥
रोकें हम कुप्रयास सभी,
जो प्रकृति संतुलन को तोड़ें।
पर्यावरण से हो विमुख
हम स्वयं ही संकट को जोड़े।
दोहन धरती का रोकें हम
चलें कुठार तो टोकें हम।
निज स्वार्थ को तज,अपनी धरा को
बंजर होने से रोकें हम॥
कृतज्ञता हर सांस में भरकर,
पर्यावरण को सुरम्य बनाएँ।
पंचतत्वों के महत्व को समझें
इनको ही अपना वैद्य बनाएँ ॥
पुण्य धरा पर जीवन पाकर
धरा का ऋण उतारें हम।
संरक्षण का दीप जलाएँ,
सजगता लायें कर्तव्यों में हम॥
आओ करें प्रतिज्ञा इतनी
संरक्षण का आह्वान करेंगे।
पर्यावरण के हर घटक से
नव गुलशन निर्माण करेंगे॥

साहित्यकार

