– वंदना त्रिपाठी
पर्यावरण को बचाना है जरूरी,
नहीं तो हम भी नष्ट हो जायेंगे,
सूना सूना जग होगा निरजन होगा वन,
ना होगी वृक्षों की छाया
ना फल फूल सब्जियां होंगी,
नहीं मिलेगी जड़ी बूटियां
प्रकृति असंतुलित होगी,
कहीं बाढ़ कहीं सूखा होगा,
भूकम्प होगा बार बार, धरती थरथरायेगी,
पंछियों के बसेरे होगें नष्ट,
पशु भी ना रह पायेगें,
नदी नाले सूख जायेगें नहीं मिलेगा पानी,
अभी भी कम है पीने योग्य पानी,
बचा हुआ काम करेगी पालिथिन प्रयोग,
ना फेंकना उसको इधर उधर
नहीं गले प्लास्टिक कभी,
कागज के झोले का करें प्रयोग,
अब जागें हम सब पेड़ लगायें,
बच्चे बाद मे ना करें सवाल पेड़ कहां उगते थे,
कम करें प्रकृति का दोहन ना तो मुश्किल होगा जीवन,
खत्म हो जायेगी धरा की सुंदरता,
जीवन भी नष्ट हो जायेगा
बीमारी का घर तन होगा बहुत कम जीवन होगा,
आर्गेनिक खेती को दें बढ़ावा,
स्वस्थ हो में सदा,
शुद्ध हवा को बहने दो पेड़ों को रहने दो,
पेड़ लगाओ करो सुरक्षा इनकी,
दिन आयेगा फिर अच्छा,
प्रकृति का सुरम्य वातावरण,
रहने दो इसे हरा भरा,
पेड़ हमारे जीवन दाता,
अद्भुत कृति विधाता की,
पेड़, नदियों की हम पूजा करते,
फिर पेड़ काटते स्वार्थ वश,
बना रहे कंक्रीट के जंगल,
हरियाली हो रही नष्ट,
मानवता रही कहां,
सुनों प्रकृति की चित्कार,
बचा लो धरा को,
ना चलो पतन की राह,
आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या उजाड़ धरती छोड़ जाओगे।
गर्मी बढ़ रही निरंतर,
सर्दी भी बढ़ रही, प्रकृति असंतुलित हो रही,
ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रहा,
जागो अब सुनों प्रकृति धरा की पुकार,
नहीं माफ नहीं करेगी प्रकृति,
पर्यावरण को रहने दो स्वच्छ,
पेड़ लगा करो सुरक्षा इनकी,
हैं बहुत जरूरी अब बहुत खोया अब तो जागें।

साहित्यकार

