– अनीता सक्सेना
हम सूरज से कभी नहीं कहते क्यों तपते हो इतना ?
हम धरती से कभी नहीं कहते ,क्यों सहती हो इतना ?
हम नदियों से नहीं कहते , क्यों बहती हो इतना ?
हम हवाओं से भी नहीं कहते ,क्यों चलती हो इतना ?
जाते हुए सूरज से भी हम कुछ नहीं कहते, बस दीप जला देते हैं ,
आते हुए सूरज को देख, बस शीश नवा देते हैं
हम किसी से कुछ नहीं कहते ये फितरत है हमारी ,
और बिन मांगे ही देती आई , ऐसी कुदरत है हमारी
लाड़ में बहुत बिगड़े हैं हम, हमने सीखा है सिर्फ लेना,
नदियाँ सूखी, गुम गए जंगल, तब पता चला,क्या होता है देना
नदियों के तट दूर हो गए, कुएँ – बावड़ी सब हैं रीते,
यक्ष प्रश्न है खड़ा सामने, न होगा पानी, तो क्या हम रहेंगे जीते ?
हमको अपने कर्मों का अब मूल्य चुकाना होगा ,
मित्रों, सूखी हुई नदियों को हमें फिर से जिलाना होगा
अर्क हमें सूरज को नहीं पेड़ों को चढ़ाना होगा और
हर एक पेड़ के बदले हमें दस पेड़ लगाना होगा
चुप रहने से कुछ काम नहीं बनेगा बंधु ,
बहरे हो चुके कानों में ,हमें शंख फुकाना होगा !
जी-जान लगानी होगी ,पसीना बहाना होगा ,
कुओं के पानी और पेड़ों की हरियाली को वापस लाना होगा !
तभी यह बेजुबान प्रकृति ,फिर से मुस्कुरा पाएगी और तभी
आने वाली पीढ़ी हमें माफ़ कर पाएगी !

वरिष्ठ साहित्यकार एवं
पूर्व प्रान्ताध्यक्ष हिन्दी लेखिक
संघ भोपाल

