– डॉ. कुंकुम गुप्ता
वृक्षों में होता स्पंदन
जल न मिले तो करते क्रंदन
मुरझा जाते हैं असमय ही
निसर्ग का हम करते वंदन
पौधे जब वृक्ष बनते हैं
उनके पत्ते कितना हँसते हैं
झूम-झूम कर हवा के संग
बचपन से तरुण बनते हैं
यदि जमीन पर जल जंगल है
तो फिर मंगल ही मंगल है
बेशकीमती चीजें पाकर भी
वृक्षों से मानव करता छल है
वृक्ष वायु का शोधन करते
मानव तन ऊर्जा से भरते
वृक्षों को हम कटने ना देंगे
आज शपथ मन में हैं करते
बदलने होंगे कुछ प्रतिमान
प्रकृति का रखना हमको ध्यान
बचे रहें वन उपवन जंगल
वरना वृक्षों का होगा अवसान

साहित्यकार
पूर्व प्रान्ताध्यक्ष हिन्दी
लेखिका संघ भोपाल

