– डॉ साधना गंगराड़े
मशीनों से तूने मुझे रौंदा
एक बीज से
दिया तुझे अनगिनत
ज्यादा की चाहत में
रसायन मुझ पर डाला
मेरे साथ
कीट पतंगे
विलुप्त किए
माँ भी चाहती
तेरे कदम
मुझे छुए
हाथ मुझे सहलाए
अपना प्यार लुटाए
मशीनों का साथ
करवाई कटाई
इतना तो ठीक था
मर्मता तो तब हुई
तूने नरवाई जलाई
मेरी देह को
निर्ममता से जलाया
मैं भी तो मां हूं
जलकर भी दूंगी
जो बन पड़ेगा
तुमने पर्यावरण का
किया बुरा हाल
प्रदूषित किया पवन को
धरती को बेहाल
संभल जा वक्त है
धरती कब तक सहेगी
तूने जो चुना
रसायन, राख
तुझे कर देगी खाक।

साहित्यकार
एवं प्रान्ताध्यक्ष हिन्दी
लेखिका संघ भोपाल

