-सुनीता यादव
अमराई से खुल गये, मौसम के सब भेद।
खाली खाली डाल है, कोयल को है खेद।।
सदासुहागन मोगरा, भूले देसी यार।
साइकस फाइकस उगे, रोपे पाॅम हजार।।
प्लास्टिक से सज गये, गमले तोरण द्वार।
रुठी-रुठी फिर रही, गेंदे की मनुहार।।
मानव ने जब ले लिया, लोटे से संन्यास।
बोतल से पीता फिरे, पहुँचा रोगस पास।।
काटो मत तुम पेड़ को, इससे ही है आस,
वृक्ष सांस छोड़ें तभी, हमको आये श्वांस।।
आज वही प्यासी खड़ी, जो बुझाये प्यास।
टनो कचरा बहा रहे, फिर भी जल की आस।।
एक पेड़ इतना लगा, ऊंचा तुझ से जाय।
तुम भी फल को खा सको, पीढ़ी भी फल खाय।।

साहित्यकार

