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पेड़ की आत्मकथा

-सीमा जैन

छाया थी जब तक मेरी
घर पर तुम्हारे, कहते थे तुम
नहीं जरूरत मुझे ए सी की
छत पर मेरी है छाँव घनेरी,

नहीं जरूरत अलार्म की
पंछियों के कलरव से
होती है भोर मेरी,

हरा भरा सा आँगन मेरा
चींटी चिड़िया गिलहरी
चुगते हैं दाना हर ओर
मचाते हैं मीठा सा शोर,

जिस दिन हटी छाया
बुजुर्गों की घर से
बेटे ने घर तोड़, मकान बनाया
सबसे पहले मुझे कटवाया,

सुबह अब भी होती है, पर
पंछियों के कलरव से नहीं
मोबाइल के अलार्म से
छाया अब भी है पर मेरी नहीं
नए अंदाज़ की छतीरियों से,

एक दिन जब बेटे का बेटा
स्कूल से आया, बोला पापा
आज मास्टर जी ने सबको
आक्सीजन का महत्व बताया

एक पौधा एक जीवन ये भी समझाया,
तब बाप बेटे ने ये ठाना
हर जन्मदिन पर एक पौधा है लगाना,


मैं मन ही मन मुसकाया
आज दादा का पोता
है वापस आया,
फिर से होगी घर पर
छाँव घनेरी, होगा पुरखों
का साया, खुश हूँ मैं
मेरा सब्र काम आया!

साहित्यकार


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