भोपाल डेवलपमेंट प्लान के नक्शे में अलग-अलग रंगों और कोड (Codes) दिए है। अगर इन रंगों (Zones) को भोपाल की भौगोलिक बनावट (पहाड़ , झीलें और जंगल) के साथ जोड़कर देखें, तो योजना के विपरीत प्रभाव (Adverse Impacts) बहुत स्पष्ट नजर आते हैं।
- जल स्रोतों और झीलों पर सीधा खतरा (Threats to Water Bodies)…
*भोजताल (Upper Lake & Lower Lake): नक्शे में झील के चारों ओर हल्के हरे (Light Green) रंग का BIZ (Bhoj Wetland Impact Zone) दिखाया गया है। लेकिन इसके ठीक बाहर चारों तरफ गहरे नारंगी (Dark Orange) रंग का RG-4 (Residential General-IV – New Proposed Residential Area) दिखाया है जो साफ साफ दर्शाता है कि भविष्य में झील के कैचमेंट एरिया (Catchment Area) में बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगल खड़े होंगे। जिसके फलस्वरूप बारिश का पानी जमीन में रिचार्ज नहीं होगा और झील में यहाँ की बसाहट का गंदा पानी (Sewage) तालाब में जाएगा।
*केरवा और कलियासोत झीलें (दक्षिणी भाग): नक्शे के दक्षिण में केरवा (Kerwa) और कलियासोत (Kaliasot) झीलों के आसपास भी भारी मात्रा में नारंगी (RG-4) और पीले (CMU – Commercial) रंग भरे गए हैं। इससे इन छोटे जलाशयों का अस्तित्व खतरे में पड़ना तय है।
*नदियाँ और नाले: नक्शे में नीली रेखाओं से (Waterbodies/Canals/Nalas) के किनारे-किनारे सड़कें (Transportation) और आवासीय क्षेत्र प्रस्तावित हैं। इससे नालों का प्राकृतिक बहाव तो बाधित होगा ही साथ ही भविष्य में बाढ़ (Urban Flooding) की समस्या भी खड़ी होगी । - वनों और वन्यजीवों पर प्रभाव (Impact on Forests & Wildlife)
*दक्षिण-पूर्वी भाग (रातापानी टाइगर रिजर्व की ओर): नक्शे में दक्षिण-पूर्व (नीचे की ओर) गहरे हरे रंग (G-5 – City Forest) और धारीदार/पैटर्न वाले क्षेत्र ESZ (Eco-Sensitive Zone) दिखाए गए हैं। यह रातापानी वन्यजीव अभयारण्य का बफर जोन है।
*खतरा: अगर हम नक्शे को देखें, तो नारंगी (RG-4) और पीले रंग के क्षेत्र सीधे तौर पर इस ESZ और हरे क्षेत्रों को काट रहे हैं। साथ ही काली मोटी लाइनें (Transportation/Proposed Roads) यहाँ के जंगल के बीचों-बीच से गुजर रही हैं। इससे वन्यजीवों का आवागमन (Wildlife Corridor) बुरी तरह प्रभावित होगा, जिससे निश्चित ही मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) बढ़ेगा।
- टेक्स्ट डॉक्यूमेंट के अनुसार, यह 51 किमी लंबा और 75 मीटर चौड़ा बायपास है, जिसके दोनों तरफ 300 मीटर तक विकास किया जाएगा। इससे सबसे बड़ा खतरा यह है कि जो क्षेत्र अभी खेत (Agriculture – AG) और खाली हैं, वहां अनियोजित रूप से (Ribbon Development) शहरीकरण फैल जाएगा। यह भोपाल के बाहर की हरियाली और प्राकृतिक जल निकासी (Natural Drainage) को तहस-नहस कर देगा।
- पहाड़ियों पर अतिक्रमण (Hills and Topography):
*नक्शे के मध्य और दक्षिणी हिस्से में कई पहाड़ियाँ हैं (जैसे अरेरा हिल्स, श्यामला हिल्स आदि)। मास्टर प्लान योजना में कागजों पर 15% से अधिक ढलान पर निर्माण की मनाही है, लेकिन नक्शा दिखाता है कि पहाड़ियों के आसपास और ढलानों पर भी RG-4 (आवासीय) और CMU (व्यावसायिक) ज़ोन बनाए गए हैं। इससे पहाड़ियों के कटाव (Soil Erosion) और भूस्खलन का खतरा बढ़ेगा।


प्रस्तावित योजना और संलग्न नक्शा साफ तौर पर दर्शाता है कि विकास के नाम पर भोपाल की प्राकृतिक विरासत (झीलें, जंगल और पहाड़ियाँ) को चारों तरफ से घेरने (Encroachment) की भविष्य में तैयारी है जो नारंगी (Orange) रंग का विस्तार दिख रहा है, वह सीधे तौर पर पर्यावरणीय क्षरण का संकेत है।
अतः पूर्व में प्रेशित मेरी रिपोर्ट एवं इस प्रस्ताव के अनुसार पुनः गहन विचार कर निम्नलिखित सुझाव हैं :
- भोजताल के कैचमेंट जोन में प्रस्तावित (BIZ Zone) के बाहर RG-4 (नए आवासीय क्षेत्र) को हटाया जाए ताकि झील का एरिया और कैचमेंट सुरक्षित रहे।
- दक्षिण-पूर्व में ESZ (Eco-Sensitive Zone) और G-5 (City Forest) के पास से गुजरने वाली प्रस्तावित सड़कों को वन्यजीव कॉरिडोर को ध्यान में रखते हुए रि-डिजाइन किया जाए या उनका रूट बदला जाए।
- केरवा और कलियासोत झीलों के आसपास के हरे क्षेत्रों को आवासीय (RG-4) से हटाकर ‘संरक्षित क्षेत्र’ (Conservation Zone) घोषित किया जाए।
- रातापानी टाइगर रिज़र्व
के (Eco-Sensitive Zone) से होकर पक्की सड़क वर्तमान रातापानी वन्यजीव अभयारण्य का बफर जोन में प्रस्तावित है जो मैंन एनिमल के भविष्य के खतरे का संकेत है l वन और वन्यप्राणी विभाग म. प्र. से वरिष्ठ अधिकारीयों को उक्त सभी फाइनल करने के पूर्व इस मास्टर प्लान 2047 पर ही व्यापक चर्चा अवश्य ही करली जाए, यह प्रत्यावित है l

Jagdish Chandra
(These are personal opinion of the author)

