-कमल चंद्रा
धरती, अवनि, धरणी, मैं कहलाऊं,
सदियों का इतिहास लिए मैं जीती जाऊं।
हाँ! मैं धरती हूँ..
रत्नों को मैं धारण करती,
और बसुंधरा कहलाती हूँ।
पर खोद खोद कर कोख उजाडी
अब बंजर होने है तैयारी.।
हाँ! मैं धरती हूँ…
सदियों से पोषित करती आईं,
खेत-खलिहान, वन-उपवन सब।
गैस, तेल, खनिज, लवण सब,
मैं पेट तुम्हारा भरती आईं।
हाँ! मैं धरती हूँ..
जीर्ण श्रंगार करता पतझड़ मेरा,
नवअंकुर प्रस्फूटित कर मैं मुस्काती।
ओढ़ चुनरिया हरितिमा की,
पावन स्नेह मैं बरसाती।
हाँ! मैं धरती हूँ..
तपती हूँ जार-जार रोती हूँ,
ज़ब सीना जख्मी करते हो मेरा।
मैं भरभरा कर गिर जाती हूँ,
मीलों तक बह जाती हूँ।
हाँ! धरती हूँ..
माँ की सी ममता देती आईं,
नारी की उपमा बनती आईं।
धरणी बन दुःख सहती आईं,
टूट-टूट कर जुड़ती आईं।।
हाँ! मैं धरती हूँ..
कहीं धधकती दवानल से,
जख्मी करती अपने आँचल को।
लावा की विनाश लीला को देखो,
उजड़-उजड़ कर बसती आईं।।
हाँ! मैं धरती हूँ..
मेरे घावों को देखो और सोचो?
मानवता का परिणाम यही है?
प्रलय काल पर क्या पाओगे?
लुप्त सभी तुम हो जाओगे। हाँ! मैं धरती हूँ..

साहित्यकार

