-शकुंतला कालिया
हरी भरी ये धरा हमारी,,
सुंदर और प्राणोंसे भी प्यारी।
नदियां गातीमीठा गान,,
देतीं जीवन को, पहचान।
बूंद बूंद इसकी,, बचाओ,
व्यर्थ में इसको ना, बहाओ।
हरे भरे पेड़ो से भरे ये जंगल,
देते प्राण वायु और स्वच्छ जल।
पर्यावरण का रूप है बदला,
सूरज देखो अब कितना तपता।
धरती मां का हम पर कर्ज,,
मिलकर निभायें अपना फर्ज।
पेड़ लगायें धुंआ मिटायें
धरती को प्रदूषण मुक्त बनायें।

साहित्यकार

