-किरण अरविन्द खोडके
चूं-चूं करतें शोर मचाते।
खेल रहे थे, घरौंदे में।
कभी वो उपर, कभी वो नीचे।
उड़ने को तैयार खड़े।
खुश हो देखे, चिड़िया रानी।
मन्द मन्द मुस्काती सी।
भर उड़ान आसमान में।
तिनके नरम चली लाने।
सांझ समय घर आईं तो।
पेड़ पड़ा था धरती पर।
बिखरा घोंसला उड़ रहा था।
चूजे गिरे थे, इधर उधर।
देख विदारक दृश्य ये।
तड़प उठी चिड़िया रानी।
मानव के इस कृत्य से।
उसकी आंखों से नीर बहे।
निराशा झटक उठी धैर्य से।
चोंच भरे कुछ बीज नये।
दूर जाकर वहां बिखेरें।
आस के पौधे खिलें खिलें।
अगली पीढ़ी तो पायेगीं।
आश्रय के पल कहीं कहीं।
मात दे मानव को पक्षी ने।
जंगल बसायें नये नये।

साहित्यकार

