-निरुपमा खरे
उड़ने वाला, पंखदार
रुई से कोमल, नन्हें रेशेदार पंख लिए
उड़ता फिरता हूं, हवा के झोंके के साथ
कभी ऊपर, कभी नीचे
गोते लगाता, मनमर्जियां करता
कभी जा चिपकूं किसी रमणी के गालों पर
कभी करुं अठखेलियां उसकी स्याह जुल्फों संग
कभी किसी बांकुरे के सीने से लग जाऊं
कभी किसी आंगन में खाट पर सोते
मां के लाल को हौले से छू आऊं
मां की थकी हुई, मुंदी हुई
पलकों को हल्के से चूम आऊं
मेहनतकश चरणों को सहला आऊं
किसी के आंसू पोंछू
किसी शिशु संग किलकारी मारुं,
बस, उड़ता ही जाऊं
दूर-दूर, बहुत दूर
और जब थक कर गिरूं धरा पर
बियाबान और उजाड़ जगह पर
मिट्टी में दब जाऊं
जब आएगी पहली बारिश
रिमझिम फुहारों से तर जाऊं
फिर एक नया जीवन उपजाऊं
हां मैं फिर अंकुरित हो जाऊं

साहित्यकार

