– बलजीत सलूजा
हरियाली सिमट रही धरा की
प्राणवायु कम, ताप अपार ,
वृक्ष कटे ताल भी सूखे
ऋतुचक्र असंतुलित आज,
मानव रोको प्रकृति का अति दोहन
पृथ्वी को हरित बनाने की दरकार।
कभी अग्नि के रौद्र रूप ने
ने वनों को किया स्वाह,
जीव जन्तु विलुप्त हो रहे
वनस्पति जल बन गयी राख ,
मानव रोको प्रकृति का अति दोहन
वृक्षारोपण का करें आगाज़ ।
हिम शैल भी टूटे पिघले ,
सागर, सलिला पार सैलाब
तोड़ तटबंध नीर बह निकला
हुए जालमग्न खेत घरबार ,
सागर तल की बढ़ती ऊंचाई से
टीपो के जल समाधि होने के आसार
मानव रोको प्रकृति का अति दोहन
इस अमृत के संरक्षण का करे प्रयास।
विषैली गैसों के उत्सर्जन से
नभ की छिजती ओज़ोन परत से,
विकिरण व्याप्त अवनी आकाश
प्राणी स्वास्थ्य का संकट गहराया ,
नित नई बीमारियों शरीर में व्याप्त
मानव रोको प्रकृति का अति दोहन
कार्बन प्रिंट की रोकों रफ़्तार।
जादुई मोबाइल और गैजेट्स ने
रचाया एक अद्भुत संसार,
व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम पर
उपयोगी, अनुपयोगी सामग्री का अटूट भंडार
यह भी कार्बन प्रिंट को बढ़ाता,
इस अदृश्य प्रदूषण पर भी करें विचार
मानव रोकों प्रकृति का अति दोहन
इस्तेमाल करें संयम के साथ।
प्रकृति के सीमित संसाधनों का
हम उपयोग करें, उपभोग को रोकें ,
यही बने जन – मानस की आवाज,
मानव रोकों प्रकृति का अति दोहन
संसाधनों के संरक्षण का करे आगाज।

साहित्यकार

