– वंदना गुप्ता
किसी भी स्त्री का आवरण
उसकी मर्यादा अखंड रखता है
क्यूं लाज नहीं आती…
धरती माँ का आवरण तार तार करते हो…!
धरा के आवरण को रखना होगा अक्षुण्ण….
साफ सुथरा विविधता से परिपूर्ण,
तभी धरा एक नार के समान मुस्कुराएगी …
सजल नैनों से वृष्टि को देगी आमंत्रण…!
वृष्टि भी खुल के भिगाएगी उसका आँचल…
जल स्रोत होंगे लबालब, नदियों पर रवानी छाएगी,
खेतों में फसलें लहलहाएंगी …
बहेगी स्वच्छ शीतल बयार ,
जब अनावश्यक दोहन न होगा
धरा का तब धरा आहत न होगी,
रक्षा बनेगी, भक्षक बन न डराएगी
गर रक्षा करेंगे धरती के आवरण की,
हरियाली बचाएंगे, तभी वो हमारी रक्षा कर पाएगी….
प्राण वायु होगी भरपूर…
धरा नैसर्गिक रूप में वापस आ जाएगी…..!!

साहित्यकार

