– कल्पना विजयवर्गीय
एक घना पेड़, पूरे पंख फैलाए, स्वच्छंद लहराए,
पेड़ की निश्छल छांव में, गरीब चार ठेले लगाए,
नीबू शिकंजी, नारियल पानी,गन्ने का रस तर कर जाए,
प्यार से चिड़िया, क्रीड़ा मन से चहक चहक जाएं।
ओह,पानी समय से आता है,
मेरे बचपन को पता ना था,
गंगा जमुना का पारदर्शी जल,
डुबकी लगाने का आनन्द ही कुछ और था,
सूर्य को जल देने का पवित्र दृश्य कुछ और ही था,
बरखा रानी जितनी
आती है उतनी ही आएगी,
भारत की जनसंख्या अधिक है यह सोचकर नहीं आएगी।
जंगल कटे,लकड़ी कटती चली गयी,
चूल्हे से निकलकर साज सज्जा में झोंक दी गयी,
सीमेंट,तारों,एसी,कारों से स्वच्छ हवा जैसे रूठ हो गयी,
विद्युत चुम्बकीय तरंगों में चिड़िया० भेंट चढ़ गयी,
छटपटाहट गूंजने लगी।
पेड़ कट गए,छांव की तलाश में वो चार ढेले,
कभी इधर,कभी उधर भागे जानें लगे,
प्रकृति का रौद्र रूप सामने आने लगा,
कहीं जल प्रलय, कहीं मरुस्थल गरीब को ही तरसा गए।
मानव का कर्म फल बनकर सामने आने लगा है,
कलयुग तो अभी प्रारंभ ही हुआ है।

साहित्यकार

