– बिन्दु त्रिपाठी
मैं धरा का हार हूँ,
प्रकृति का श्रृंगार हूँ।
मत करो नफ़रत मुझसे,
मैं तुम्हारा प्यार हूँ।
प्यार से देखो मुझे,
नेह जल से सींच दो।
काटने को तत्पर मुझे,
हाथ अपने रोक दो।
त्राहि -त्राहि मच रही,
जल जंगल, जमीन पर।
प्रखर ताप चढ़ रहा,
धरा का सौंदर्य भी अब
कुछ फीका सा पड़ रहा।
सूखी धरा, सूखे कंठ,
रुठे बादल रुठे इंद्र।
कारण मनुज ही बन रहा,
हाथ मे ले कर कल्हाड़ी।
वृक्ष काट कर महल सजाये,
महल तो सज गए,
पीने को जल नहीं।
बाग तो बनवा दिया,
सिंचन का विकल्प नहीं।
सूख रहे तरुवर, सूख रही धरा।
और अब मत देर करो,
करो धरा को फिर हरा।
बचा लो पेड़ों को,
सहेज लो हरियाली।
लगा कर नए पौधे,
बिखेर दो खुशहाली।
याद यह रखना सदा तुम,
*एक वृक्ष सौ पुत्र समान* ।
इनसे ही है जीवन की मुस्कान।

साहित्यकार

