– मनोरमा श्रीवास्तव
हिमाच्छादित श्वेत पर्वतों की सर्द हवाएं,
कोहरे की ओढ़े चादर
उनींदी सी लगी प्रकृति,
झीलों झरनों नदियों में इठलाती,
उल्लसित अल्हड़ लगी प्रकृति,
ओस की बूंदों में मुस्कुराती सी
कलात्मक लगी प्रकृति,
लताओं बेलों पेड़ पौधों की हरीतिमा में,
पल्लवित हो चली प्रकृति,
गाते पक्षी, खिलते फूल,
रंग बिरंगी तितलियों में,
चित्रकार सी लगी प्रकृति,
धानी चुनर ओढ़े आह्लादित,
नर्तकी सी लगी प्रकृति.
हे मानव मत काटो हरे पेड़,
अति वर्षा, भूकंप, ज्वालामुखी,
रौद्र रूप महाकाली हो गयी प्रकृति,
प्रदूषण से हाहाकारी हो,
विध्वंस की छिन्नमस्ता हो गयी प्रकृति,
दरकती धरती, आसमानी परतें,
विस्फोटक सी लगी प्रकृति,
हे मनुष्य ! सम्हल जरा, जल, ज़रा, हवा,
आग और फलक को, अर्धनारीश्वर मान,
जल,पृथ्वी,वायु,अग्नि,आकाश का
संतुलन बना,
क्योंकि यही अनमोल अनोखी,
प्रकृति है हमारी रक्षक,
मानव जीवन की जिजीविषा की अंजुरी में पंच तत्वों
के पांच मोतियों सी लगी प्रकृति ।

साहित्यकार

