Read this page in your preferred languageArticles may be originally written in English or Hindi. Use translation to read them in the other language.
1 min read

धरती की करुण पुकार

– डॉ साधना गंगराड़े

मशीनों से तूने मुझे रौंदा
एक बीज से
दिया तुझे अनगिनत
ज्यादा की चाहत में
रसायन मुझ पर डाला
मेरे साथ
कीट पतंगे
विलुप्त किए
माँ भी चाहती
तेरे कदम
मुझे छुए
हाथ मुझे सहलाए
अपना प्यार लुटाए
मशीनों का साथ
करवाई कटाई

इतना तो ठीक था
मर्मता तो तब हुई
तूने नरवाई जलाई
मेरी देह को
निर्ममता से जलाया
मैं भी तो मां हूं
जलकर भी दूंगी
जो बन पड़ेगा
तुमने पर्यावरण का
किया बुरा हाल
प्रदूषित किया पवन को
धरती को बेहाल
संभल जा वक्त है
धरती कब तक सहेगी
तूने जो चुना
रसायन, राख
तुझे कर देगी खाक।

साहित्यकार
एवं प्रान्ताध्यक्ष हिन्दी
लेखिका संघ भोपाल


Share: Facebook | X | WhatsApp

Continue Reading

Poetry

इन्सान और पेड़

1 min read

— अनुपम सक्सेना इन्सान पेड़ से बन तो गया आदमी,पर जड़ से कटते ही वो आदमी,अपने पूर्वज पेड़…

Water

जल संरक्षण

1 min read

— पुनीत चतुर्वेदी जल प्रदूषण के मामले में विश्व में भारत 120वें नंबर पर है, 123 देशों में।…