पित्ताशय की पथरी और इसके उपचार में उपयोगी औषधीय प्रणालियाँ

आचार्य बालकृष्ण 1,2, सीनूदेवी 1, उदय भान प्रजापति 1, अनुपम श्रीवास्तव 1

सारांश
पित्ताशय का मुख्य कार्य यकृत द्वारा स्रावित पित्त को संगृहीतऔर केंद्रित करना है। पित्ताशय की पथरी एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है, पित्त की पथरी मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं: कोलेस्ट्रॉल पथरी और पिगमेंट पथरी। इसके प्रमुख कारणों में पित्त का रासायनिक असंतुलन, अत्यधिक कोलेस्ट्रॉल और बिलीरुबिन शामिल हैं। पित्ताशय की पथरी के लक्षणों में ऊपरी पेट में दर्द, उल्टी और अपच शामिल हैं। उपचार के लिए मुख्यतः तीन प्रणालियाँ (1. आयुर्वेदिक 2. एलोपैथिक 3. होम्योपैथिक) हैं। आयुर्वेदिक उपचार, जिसमें जड़ी-बूटियों और खान-पान में सुधार किया जाता है, जिसके लिए कई औषधीय पौधे जैसे एपियम ग्रेवियोलेंस, बौहिनिया क्यूमेनेंसिस, और कॉस्टस स्कैबर का उपयोग किया जाता है। भारत में औषधीय पौधों की प्रचुरता और उनका पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग महत्वपूर्ण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 20,000 औषधीय पौधों की सूची में भारत का योगदान 15-20% बताया है। एलोपैथिक उपचार में दवाओं का उपयोग और पित्ताशय-उच्छेदन (कोलेसिस्टेक्टॉमी) शामिल है, जबकि होम्योपैथिक उपचार में पादप निर्मितपदार्थोंका उपयोग किया जाता है।

मुख्य शब्दः पित्ताशय, पथरी रोग, पित्ताशय की पथरी, आयुर्वेदिक, एलोपैथिक, होम्योपैथिक

परिचयः
पित्ताशय शरीर के दाईं ओर स्थित एक छोटी थैली है, जो यकृत के ठीक नीचे होती है और पित्त को संगृहीत करती है। पित्त जिसे पित्त रस भी कहा जाता है, यकृत द्वारा निर्मित एक हरा-भूरा तरल है। पित्त मुख्य रूप से वसा के पाचन को सुविधाजनक बनाने के लिए पित्त नलिकाओं के माध्यम से छोटी आंत में जाता है। पित्ताशय में कई बीमारियाँ होती हैं और उनमें से एक पित्त पथरी (कोलेलिथियसिस) प्रमुख है। [Gururaja et al., 2014]। पित्त की पथरी कुछ और नहीं बल्कि पित्ताशय में कोलेस्ट्रॉल और पित्त वर्णक का संग्रहणहै। पिछले कुछ वर्षों से गुर्दे और पित्ताशय की पथरी की बीमारी, एक विश्वव्यापी और बड़ी समस्या है। प्रकृति औषधीय पौधों की प्रचुर संपदा सेसंवर्द्धितहै। सदियों से पौधों का उपयोग पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के रूप में किया जाता रहा है। WHO ने वैश्विक स्तर पर 20,000 औषधीय पौधों को सूचीबद्ध किया है जिसमें भारत का योगदान 15-20% है [Shashi et al., 2013] IWHO ने बताया कि वैश्विक स्तर पर 80% देश औषधीय पौधों पर निर्भर हैं [Choubey et al., 2010]। वैश्विक स्तर पर 72000-77000 (विश्व वनस्पतियों का 17-18%) पौधे वर्तमान में औषधीय उद्देश्य के लिए उपयोग किए जाते हैं [Choubey et al., 2010]। भारत में, उच्च पौधों की 17,000 प्रजातियों में से 7500 औषधीय उपयोगों के लिए जानी जाती हैं [Kala et al., 2006]। पित्त पथरी के उपचार में उपयोग किए जाने वाले विभिन्न पौधे जैसे एपियम ग्रेवियोलेंस, बौहिनिया क्यूमेनेंसिस, बौहिनिया एक्साइज, कोस्टस स्कैबर, चामेसिस हिर्टा, सिसस वर्टिसिलाटा, कैप्रारिया बाईफ्लोरा, कॉकोस न्यूसिफेरा, एलुसीन इंडिका, फाइकस कैरिका, गोम्फ्रेना ग्लोबोसा, कैलंचोइ पिनाटा, पोर्तुलाका ओलेरैसिया, सोलनम मेलोंजेनाआदि हैं [Gururaja et al., 2014]

पित्ताशय की शारीरिक रचना और कार्य
पित्ताशय 7-10 सेमी लंबा, अपने सबसे चौड़े हिस्से में 3 सेमी चौड़ा और 30-50 मिली लीटर क्षमता वाला होता है [Srivastava, & Khan, 2019]1 इसे फंडस, बॉडी और गर्दन के रूप में वर्णित किया गया है। फंडस, एक फैला हुआ सिरा है जो नीचे, आगे और दाईं ओर फैला हुआ है, जो नौवें दाएं कॉस्टल कार्टिलेज के पीछे पूर्ववर्ती उदर की दीवार के संपर्क में आने के लिए यकृत की निचली सीमा से आगे तक फैला हुआ है। बॉडी, ऊपर, पीछे और बाईं ओर निर्देशित है; पोर्टा के दाहिने छोर के पास यह पित्ताशय की गर्दन के साथ निरंतर है। गर्दन, संकरी है जो आगे की ओर और फिर अचानक पीछे और नीचे की ओर निकलती है, जो सिस्टिक डक्ट बन जाती है [Srivastava, & Khan, 2019]। पित्ताशय का मुख्य कार्य यकृत द्वारा स्रावित पित्त को संगृहीत और केंद्रित करना है और फिर इसे पाचन और वसा के अवशोषण के लिए आंत में पहुंचाना है [Gururajaet al., 2014]

पित्त की पथरी के प्रकार
पित्त की पथरी ठोस पदार्थ के टुकड़े होते हैं, जो आमतौर पर कोलेस्ट्रॉल या बिलीरुबिन से बने होते हैं, जो पित्ताशय में बनते हैं। पित्त की पथरी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है-

कोलेस्ट्रॉल की पथरी – ये पथरी पीले-हरे रंग की होती है। इस पथरी का मुख्य घटक कोलेस्ट्रॉल होता है
पिगमेंट स्टोन- ये गहरे रंग के और आकार में छोटे होते हैं। इस पथरी का मुख्य घटक बिलीरुबिन होता है।

पित्ताशय की पथरी के कारण
पित्त की पथरी का वास्तविक कारण पित्ताशय की थैली के अंदर पित्त के रासायनिक असंतुलन को माना जाता है। हालांकि शोधकर्ता अभी भी इस बारे में स्पष्ट नहीं हैं कि वास्तव में असंतुलन किस कारण से होता है, लेकिन इसके कुछ संभावित कारण हैं-

बहुत अधिक कोलेस्ट्रॉल
आपके पित्त में बहुत अधिक कोलेस्ट्रॉल होने से पीले कोलेस्ट्रॉल के पत्थर बन सकते हैं। ये कठोर पत्थर तब विकसित हो सकते हैं जब आपका लिवर आपके पित्त द्वारा घुलने वाले कोलेस्ट्रॉल से अधिक कोलेस्ट्रॉल बनाता है।

बहुत अधिक बिलीरुबिन
बिलीरुबिन एक रसायन है जो लाल रक्त कोशिकाओं के सामान्य टूटने के दौरान उत्पन्न होता है। इसके बनने के बाद, यह लिवर से होकर गुजरता है और अंततः शरीर से बाहर निकल जाता है। कुछ स्थितियाँ, जैसे कि लिवर की क्षति और कुछ रक्त विकार, आपके लिवर को ज़रूरत से ज़्यादा बिलीरुबिन बनाने का कारण बनते हैं। पिगमेंट पित्त पथरी तब बनती है जब आपका पित्ताशय अतिरिक्त बिलीरुबिन को नहीं तोड़ पाता। ये कठोर पत्थर अक्सर गहरे भूरे या काले रंग के होते हैं।

पित्त का गाढ़ा होना
आपके पित्ताशय को ठीक से काम करने के लिए अपने पित्त को खाली करने में सक्षम होना चाहिए। यदि यह अपनी पित्त सामग्री को खाली करने में विफल रहता है, तो पित्त अत्यधिक गाढ़ा हो जाता है, जिससे पथरी बन सकती है। [https://www.healthline.com]

पित्ताशय की पथरी के लक्षण
पित्त की पथरी आमतौर पर लक्षण पैदा नहीं करती है। लक्षण केवल तब होते हैं जब पित्त की पथरी फंस जाती है और आपके सिस्टम में पित्त के प्रवाह को अवरुद्ध कर देती है। जो निम्नलिखित हो सकते हैं-

  • अक्सर दाईं ओर, पसलियों के ठीक, नीचेऊपरी पेट के हिस्से में दर्द
  • दाहिने कंधे या पीठ में दर्द
  • पेट खराब होना
  • उल्टी
  • अन्य पाचन संबंधी समस्याएं, जिनमें अपच, सीने में जलन और गैस शामिल हैं। [https://www.webmd.com]

पित्ताशय की पथरी का उपचार
उपचार के लिए मुख्यतः तीन प्रणालियाँ
(1. आयुर्वेदिक 2. एलोपैथिक 3. होम्योपैथिक) हैं।

१. आयुर्वेदिक उपचार – आयुर्वेदिक पद्धतिएक प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली है, जो रोग के मुल कारण कोसमझकर रोग को ठीक करने के लिए सही उपचार प्रदान करती हैं। आयुर्वेदिक उपचार में जड़ी बूटियों और खान-पान में सुधार कर रोग का इलाज किया जाता हैं। निम्न सारणी में पित्ताशय की पथरी के उपचार में प्रयुक्त पौधोंकी सूची सन्दर्भ सहित दी गयी हैं।

तालिका 1: पित्ताशय की पथरी के उपचार में प्रयुक्त होने वाले पौधों की सूची

नामसाधारण नामउपयोगी भागसन्दर्भ
ऐपियम ग्रैवियोलेन्स
Apium graveolens L..
अजमोदबीज, फलियाँ, पूरा पौधा सब्जी के रूप में[Shashi et al., 2013], [Gururaja et al., 2014], [Fazal et al., 2012].
श्वेला ग्लैब्रा
Schnella glabra (Jacq.) Dugand (Syn. Bauhina cumanensis Kunth)
मंकी स्टेप प्लांटछाल, पत्ते.[Shashi et al., 2013], [Gururaja et al., 2014], [Chinsembu et al., 2011], [Lans, 2006]
श्वेलाएक्साइज़ा
Schnella excisa Griseb. (Syn. Bauhinia excisa)
वीपिंग वैटलपत्ते[Shashi et al., 2013], [Gururaja et al., 2014], [Chinsembu et al., 2011].
कॉस्टस स्कैबर
Costus scaber
Ruiz & Pav.
इंडियन हेड जिंजरपत्ते[Shashi et al., 2013], [Gururaja et al., 2014
यूफॉर्बिया हिर्टा
Euphorbia hirta L.
(Syn. Chamaesyce
hirta (L.) Millsp.)
अस्थमा प्लांट, अस्थमा वीडपत्ते[Shashi et al., 2013], [Gururaja et al., 2014], https://keyserver.lucidcentral.org/]
सिसस वर्टिसिलेटा
Cissus verticillata (L.) Nicolson & C.E.Jarvis
प्रिंसेस वाइन,
पोसमग्रेप वाइन
पत्ते[Shashi et al., 2013], [Gururaja et al.2014], [https://www.nparks.gov.sg/florafaunaweb]
कैप्रारिया बाइफ्लोरा Capraria bifloral.गोट वीडसंपूर्ण पौधा[Shashi et al., 2013], [Gururaja et al., 2014]
कॉकोस न्यूसिफेरा
Cocos nucifera L.
नारियल ताड़पत्ते और जड़ें, फल[Shashi et al., 2013], [Gururajaet al., 2014], [DebMandal& Mandal, 2011].
एल्यूसिन इंडिका
Eleusine indica (L.) Gaertn.
ग्रूज़ग्रास, वायरग्राससंपूर्ण पौधा[Shashi et al., 2013], [Gururajaet al., 2014], [Zakri et al., 2021]
फाइकस कैरिका
Ficus carica L.
अंजीर का पौधाफल, लेटेक्स[Shashi et al., 2013], [Gururajaet al., 2014], [Badgujar et al., 2014]
गोम्फ्रेना ग्लोबोसा Gomphrena globosalग्लोब ऐमारैंथ, बैचलर बटन, केनोप फूल। गुलेमखमल।संपूर्ण पौधा[Gururajaet al., 2014], [Esmat, et al., 2020]
कैलेन्चोई पिन्नाटा Kalanchoe pinnata (Lam.) Persकैथेड्रल बेल्स, एयर प्लांट, लाइफ प्लांट, मिरेकल लीफ, गोएथे प्लांट और कटकाटाका।पत्ते[Gururajaet al., 2014]
पोर्तुलाका ओलीरेसिया Portulaca oleracea L.पर्सलेन, लिटिल हॉगवीड, या पर्ले, लोना बृहदवायवीय भाग[Shashi et al., 2013], [Gururaja et al., 2014], [Iranshahy,et al., 2016]
टैमारिंडस इंडिका Tamarindus indicaL.टैमारिंडस, इमलीसंपूर्ण पौधा[Shashi et al., 2013], [Gururaja et al., 2014], [Kuru, 2014]
ऐकिलीया मिलीफोलियम Achillea millefoliumLगैंडरैन पुथकांदा, भूत केसी, बोमाडेरनफूलदार शाखाएँ या पत्तियाँ[Ahmed et al., 2020],
Ali et al., 2017,
Latifian et al., 2018]
एग्रीमोनिया यूपेटोरिया Agrimonia eupatoria L.एग्रीमनी, स्टिकल राइट, कॉकलेबर्र, स्टिकवॉर्टसंपूर्ण पौधा[Ahmed et al., 2020], [Al-Snafi, 2015]
रूबिया कॉर्डिफोलिया Rubia cordifolia L.मैडर याइंडियनमैडर, मजिष्ठ, अरुणाजड़ें[Verma et al., 2016].
सेरोपीजिया बल्बोसा Ceropegia bulbosa Roxb.कौडिसीफॉर्मकंद[Shashi et al., 2013], [Bijauliya et al., 2017]
ज़िया मेज़ Zea mays L.मक्काबीज तेल / टैसल[Shashi et al., 2013], [Bijauliya et al., 2017]
ओसीमम टेनुइफ्लोरम Ocimum tenuiflorum
L. (Syn. Ocimum sanctum L.)
पवित्र तुलसी, तुलसीसंपूर्ण पौधा[Das et al., 2005],
[Bano et al., 2017]
सिज़ीज़यम क्यूमिनी Syzygium cumini (L.) Skeelsजामुन या जाम्बुल,
ब्लैकबेरी, ब्लैक प्लम
पत्ते, छाल, फल, बीज।[Das et al., 2005], [Srivastava et al., 2013]
बेरबेरिस वल्गेरिस
Berberis vulgaris L.
बरबेरीफल, जड़ छाल[Das et al., 2005], [Bijauliya et al., 2017], Zareiet al., 2015]
टिनोस्पोरा कॉर्डीफोलिया Tinospora cordifolia (Willd.) Hook.f. & Thomsonअमृता, गुर्चा या जेतवाटिका, गुडुची या गिलोयसंपूर्ण पौधाSumriti et al., 2013], [Panchabhai et al., 2008]
ट्राइऐन्थेमा पोर्तुलाकास्ट्रम Trianthema portulacastrum L.विशाखपारा, लाल-साबुनी, श्वेत-साबुनीसंपूर्ण पौधा[Shivhare et al., 2012], [Sumriti et al., 2013].
रैफेनस रैफेनिस्ट्रम उप. सैटाइवस
Raphanus raphanistrum subsp. Sativus(L.) Domin (Syn. Raphanus sativus L.)
मूलीपत्तियां और जड़ें, बीज[Sumriti et al., 2013], [Gutiérrez et al., 2004]
क्रैटीवा रिलिजिओसा Crateva religiosa G.Forst.हुक और फ्रॉस्टछाल, पत्ते, जड़ें[Sumriti et al., 2013], [Patil et al., 2011]
ट्रिबुलस टेरेस्ट्रिस
Tribulus terrestris L.
काल्ट्रोप, गोखरू छोटाफल, बीज[Sumriti et al., 2013], [Akram et al., 2011]
बर्जेनिया पैकुम्बिस Bergenia pacumbis (Buch.-Ham. ex D.Don) C.Y.Wu & J.T.Pan (Syn. Bergenia ligulata Engl.)पाषाणभेदप्रकंद और पत्तियां[Sumriti et al., 2013]
विग्ना अंग्विकुलेटा
Vigna unguiculata (L) Walp.
कुलत्थाबीज[Sumriti et al., 2013], [Boukar et al., 2019]

चित्र 1: पित्ताशय की पथरी के उपचार में प्रयुक्त होने वाले पौधे

चित्र 2: पित्ताशय की पथरी के उपचार में प्रयुक्त होने वाले पौधे

2. एलोपैथी उपचार – एलोपैथिक उपचारमें मूलतः एलोपैथिक दवाओं का उपयोग और पथरी निकालने के लिए शल्य चिकित्सा प्रक्रियाएं शामिल हैं।

2.1 एलोपैथिक दवाएँ– 24 घंटे के मूत्र संग्रह के परिणाम के आधार पर, विभिन्न प्रकार के पथरी के लिए अलग-अलग उपचार विकल्प हैं। अब इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि विशिष्ट जैव रासायनिक असामान्यताओं का इलाज करके, पुनरावृत्ति दर को कम किया जा सकता है। साहित्य समीक्षा के आधार पर तीन प्रकार की सिंथेटिक दवाओं की पहचान की गई है जिनका उपयोग पित्ताशय की पथरी के एलोपैथिक उपचार में किया जाता है। ये हैं कोलिक एसिड (एक पित्त अम्ल व्युत्पन्न), फ्लुवास्टेटिन (लेस्कोल) और जेमफिब्रोज़िल (फाइब्रिक एसिड व्युत्पन्न) [Shashi et al., 2013]

2.2 सर्जिकल उपचार एलोपैथी पित्त पथरी हटाने की सर्जरी दो प्रकार की होती है, एक ओपन सर्जरी और दूसरी पित्ताशय-उच्छेदन (कोलेसिस्टेक्टॉमी)
a. ओपन सर्जरी- सर्जन पेट में एक लंबा चीरा (5-7 इंच) लगाता है। सर्जिकल उपकरण द्वारा पित्ताशय की थैली को हटा दिया जाता है। चीरे को टांके लगाकर बंद कर दिया जाता है। ठीक होने में लगभग एक महीने का समय लगता है और सर्जरी के बाद घावों की उचित देखभाल की आवश्यकता होती है। [https://www.pristyncare.com]
b. लेप्रोस्कोपिक सर्जरी या पित्ताशय-उच्छेदन (कोलेसिस्टेक्टॉमी) -लक्षणात्मक पित्त पथरी वाले रोगियों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: वे जिन्हें साधारण पित्त संबंधी शूल है और वे जिन्हें जटिलताएँ हैं। पित्ताशय-उच्छेदन (कोलेसिस्टेक्टॉमी), आमतौर पर लेप्रोस्कोपिक, लक्षणात्मक पित्त पथरी वाले अधिकांश रोगियों के लिए अनुशंसित की जाती है [Abraham et al., २०१४]।

पित्ताशय की थैली को हटाने को पित्ताशय-उच्छेदन (कोलेसिस्टेक्टॉमी) के रूप में जाना जाता है [Puri, et al., २०२२] । आजकल, लेप्रोस्कोपिक पित्ताशय-उच्छेदन (कोलेसिस्टेक्टॉमी) की जाती है क्योंकि इसमें ओपन सर्जरी की तुलना में छोटे चीरे लगाए जाते हैं। लेप्रोस्कोप एक संकरी ट्यूब होती है जिसमें एक कैमरा होता है। कैमरा टीवी स्क्रीन पर पित्ताशय की थैली को देखने में मदद करता है। इसकी सहयता से प्रक्रिया पूरी की जाती है और पित्ताशय को बाहर निकाल दिया जाता है [Puri, et al., २०२२] । लैप्रोस्कोपिकपित्ताशय-उच्छेदन (कोलेसिस्टेक्टॉमी) औद्योगिकदेशों में सबसे अधिककीजानेवालीपेटकीसर्जरी है, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में सालाना लगभग 900,000 प्रक्रियाएं की जाती हैं [Abraham et al., २०१४]।

3. होम्योपैथिक उपचार- होम्योपैथी, एक चिकित्सा प्रक्रिया है जो किसी बीमारी के इलाज के लिए कम से कम मात्रा में प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग करती है। अगर पित्त की पथरी का आकार छोटा है, तो होम्योपैथिक दवाएँ इसे कम करने और समय के साथ मूत्र के माध्यम से बाहर निकालने में मदद कर सकती हैं। यह पेट दर्द जैसे लक्षणों को भी दूर करता है [https://www.pristyncare.com] I

होम्योपैथिक दवाएँ
a. कैल्केरिया कार्बोनिक
पित्ताशय की पथरी कभी-कभी पारिवारिक इतिहास के कारण हो सकती है जो जीन के साथ आती है। ऐसे मामलों में, कैल्केरियन कार्बोनिका उपचार के लिए दवा है। इसके अलावा, यह तब भी फायदेमंद होता है जब रोगी में चिंता के लक्षण हों या ट्राइग्लिसराइड्स और कोलेस्ट्रॉल की उच्च मात्रा के साथ अधिक वजन हो। [https://www.pristyncare.com] I
b. चेलिडोनियम- यह दवा उस रोगी के लिए है जिसे दाहिने कंधे के ब्लेड के नीचे दर्द और/या ऊपरी दाहिने पेट में दर्द होता है। [https://www.pristyncare.com] I
c. लाइकोपोडियम – अगर किसी मरीज के परिवार में पित्त पथरी का इतिहास रहा है, साथ ही पाचन तंत्र खराब है, गैस्ट्रिक विकार है, खराब कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर है, पेप्टिक अल्सर है, कब्ज या पेट फूलना जैसी समस्याएं हैं, तो होम्योपैथिक डॉक्टर लाइकोपोडियम कि सलाह देते हैं। [https://www.pristyncare.com]
d. नैट्रमसल्फ्यूरिकम – क्रोनिक डायरिया, पेट दर्द, अस्थमा, डिप्रेशन, मोटापा या जोड़ों के दर्द जैसी बीमारियों मेंभी यह दवा दी जाती है। इसके अलावा, रोगी पर्यावरण परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। [https://www.pristyncare.com]
e. नक्सवोमिका – यदि कोई रोगी मतली, पेट दर्द, ऐंठन दर्द, नाराज़गी, गैस्ट्रिक समस्याओं या सूजन से जूझ रहा है और तले हुए खाद्य पदार्थों का बहुत शौकीन है तो यह नक्स वोमिका पित्ताशय की पथरी को ठीक करने के लिए दी जाती है। [https://www.pristyncare.com] |

निष्कर्ष
पित्ताशय में पित्त पथरी (कोलेलिथियसिस) प्रमुखरोग है जो पित्त के रासायनिक असंतुलन के कारण बनती हैं। बहुत अधिक कोलेस्ट्रॉल, बिलीरुबिन, पित्त का गाढ़ा होनाआदि भी पथरी के लिये जिम्मेदार हैं। उपचारकेलिएमुख्यतः आयुर्वेदिक, एलोपैथिकऔर होम्योपैथिकप्रणालियाँ हैं। आयुर्वेदिकउपचार में विभिन्न पौधे जैसे एपियम ग्रेवियोलेंस, बौहिनिया क्यूमेनेंसिस, बौहिनिया एक्साइज, कोस्टस स्कैबर, चामेसिस हिर्टा, सिसस वर्टिसिलाटा, कैप्रारिया बाईफ्लोरा, कॉकोस न्यूसिफेरा, एलुसीन इंडिका, फाइकस कैरिका, गोम्फ्रेना ग्लोबोसा, कैलंचोइ पिनाटा, पोर्तुलाका ओलेरैसिया, सोलनम मेलोंजेनाआदि का उपयोग होता है। एलोपैथिक उपचारमें मूलतः एलोपैथिक दवाओं का उपयोग और पथरी निकालने के लिए शल्य चिकित्सा प्रक्रियाएं अपनायी जाती हैं। होम्योपैथिक दवाएँ जैसे कैल्केरिया कार्बोनिक, चेलिडोनियम, लाइकोपोडियम, नैट्रमसल्फ्यूरिकम और नक्सवोमिका आदि का प्रयोग होता है। आयुर्वेद में जड़ी-बूटियों का विशेष महत्व है। ये वनस्पतियाँ विभिन्न रोगों के उपचार में प्रयुक्त होती हैं। आयुर्वेद में आहार और जीवनशैली का भी महत्व है। सही आहार और व्यायाम के माध्यम से रोगों का इलाज किया जाता है। ये शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में मदद करते हैं।

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Author is
1. Patanjali Research Foundation, Haridwar, Uttarakhand-249405
2. University of Patanjali, Haridwar, Uttarakhand – 249405
*Corresponding by udaybhan.prajapati@patanjali.res.in

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