कार्बन क्रेडिट क्या है?

संग्लन – जगदीश चन्द्रा

परिभाषाः कार्बन क्रेडिट एक तरह के “परमिट” (अनुमति पत्र) है जो एक टन (1000Kg), कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) या उसके समतुल्य अन्य ग्रीनहाउस गैसों को वातावरण में उत्सर्जित करने का अधिकार किसी कम्पनी या एजेंसी को देता है। इसे ऐसे समझिएः जो कंपनी/एजेंसी एक टन प्रदूषण कम करती है, उसे ये क्रेडिट इनाम में मिलते हैं। जो कंपनी / एजेंसी अधिक प्रदूषण फैलाती है, उसे क्रेडिट जुर्माने के रूप में खरीदने पड़ते हैं। इसे इस उदाहरण से समझें: मान लीजिए सरकार ने एक नियम बना दिया कि हर कंपनी / एजेंसी को साल में 100 टन CO₂ से अधिक उत्सर्जन करने की अनुमति नहीं है। अब एसी तीन विभिन्न कंपनियों की उदहारण देखते हैं:
A. (सोलर कंपनी) 20 टन 80 टन कम कार्बन उत्सर्जन कराती है तो यह 80 क्रेडिट बेचेगी अर्थात फायदे में रहेगी।
B. (सीमेंट कंपनी) 100 टन कार्बन उत्सर्जित कर लगभग सीमा पर है अतः कुछ नहीं करेगी।
C. (कोयला कंपनी) 180 टन कार्बन उत्सर्जित कर 80 टन अधिक कर रही है तो यह 80 क्रेडिट खरीदेगी जो उसकी लिए एक प्रकार का जुर्माना है।

विवरण/व्याख्याः
कंपनी C, कंपनी A से 80 क्रेडिट खरीदती है और कंपनी A को पैसे मिलते हैं (जो वह और अधिक स्वच्छ ऊर्जा लगाने में खर्च कर सकती है) लिस प्रकार कुल कार्बन उत्सर्जन उतना ही रहता है अर्थात (A ने 20 टन किया, C ने 180 टन किया = कुल 200 टन), लेकिन पैसा उन लोगों के पास जाता है जो प्रदूषण कम कर रहे हैं। और यही है कार्बन क्रेडिट का मूल मंत्रः भी है कि, ‘प्रदूषण कम और पर्यावरण “स्वच्छता रखकर पैसा कमाओ”। कार्बन क्रेडिट का मुख्य दो तरह के बाजारों में कारोबार होता है:

(1) अनिवार्य बाजार (Compliance / Regulatory Market)
यह सरकार द्वारा अनिवार्य किया गया बाजार है जिसमें सरकार तय करती है कि “इस क्षेत्र की कंपनियों को इतना ही उत्सर्जन करने की अनुमति होगी।” जो कंपनियां सीमा से अधिक उत्सर्जन करती हैं, उन्हें जुर्माना भरना पड़ता है या कार्बन क्रेडिट खरीदने पड़ते हैं।

उदाहरण:

  • यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (EU ETS): दुनिया का सबसे बड़ा अनिवार्य कार्बन बाजार है।
  • कैलिफोर्निया कैप-एंड-ट्रेड: अमेरिका का सबसे बड़ा कार्बन बाजार है।
  • भारत की स्थितिः भारत ने अभी तक अनिवार्य कार्बन बाजार शुरू नहीं किया है, लेकिन 2026 से “कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम” (CCTS) लागू करने की योजना है।

(2) स्वैच्छिक बाजार (Voluntary Market – VCM)

  • यह वह बाजार है जहां कंपनियां स्वेच्छा से (बिना कानूनी दबाव के) कार्बन क्रेडिट खरीदती हैं और अपने “कार्बन फुटप्रिंट” को शून्य (Net Zero) करने के लिए ऐसा करती हैं।
  • CSR कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व के तहत ऐसा करना जरुरी है।
  • अपनी ब्रांड इमेज सुधारने के लिए
  • निवेशकों और ग्राहकों की मांग के कारण
  • उदाहरण: Microsoft, Google, Amazon, Apple जैसी कंपनियां स्वेच्छा से लाखों कार्बन क्रेडिट खरीदती हैं।
  • आपके चित्र में दिखाए गए 170 प्रकार के क्रेडिट ज्यादातर इसी स्वैच्छिक बाजार से संबंधित हैं।

यह समझना सबसे जरूरी है कि आखिर यह “क्रेडिट” आता कहां से और कैसे बनता है?

चरण 1: जब एक परियोजना शुरू होती है
कोई संस्था (NGO, निजी कंपनी, सरकारी एजेंसी) एक ऐसी परियोजना शुरू करती है जो उत्सर्जन कम करती है या कार्बन घटाती है। उदाहरण: एक कंपनी बिहार के गांवों में 10,000 सोलर लैंप वितरित करती है।

चरण 2: एक मानक निकाय (Standard Body) से पंजीकरण
कार्बन क्रेडिट बनाने के लिए परियोजना को किसी अंतरराष्ट्रीय मानक निकाय से मान्यता लेनी होती है। ये निकाय यह सुनिश्चित करते हैं कि परियोजना वास्तव में उत्सर्जन कम कर रही है अथवा नहीं।

प्रमुख मानक निकाय Standered Body:
1. Verra VCS (Verified Carbon Standard) दुनिया का सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला “स्वैच्छिक कार्बन मानक” (Voluntary Carbon Standard) है। इसे ‘Verra’ नामक एक गैर-लाभकारी संस्था द्वारा प्रबंधित किया जाता है Gold Standard सबसे सख्त मानक।। दुनिया का सबसे बड़ा स्वैच्छिक कार्बन मानक Hai सबसे अधिक क्रेडिट यहीं से आते हैं।
2. American Carbon Registry (ACR) अमेरिका में प्रमुख
3. Climate Action Reserve (CAR) उत्तरी अमेरिका में प्रमुख

चरण 3: आधार रेखा का निर्धारण (Baseline Calculation):
“मानक निकाय” यह गणना करता है कि “यदि यह परियोजना न होती तो कितना उत्सर्जन होता?”

उदाहरण (सोलर लैंप):

  • परियोजना के बिनाः 10,000 परिवार 100 लीटर मिट्टी का तेल प्रति वर्ष = 10 लाख लीटर
  • 1 लीटर मिट्टी के तेल से लगभग 2.5 किलो CO₂ निकलती है
  • कुल बेसलाइन उत्सर्जन: 10,00,000 × 2.5 = 2,500 टन CO₂ प्रति वर्ष

चरण 4: परियोजना उत्सर्जन का निर्धारण (Project Emissions)

  • परियोजना के कारण कितना उत्सर्जन हो रहा है? (सोलर लैंप बनाने, ट्रांसपोर्ट करने आदि से)

चरण 5: उत्सर्जन में कमी की गणना (Emission Reductions)
उत्सर्जन में कमी = बेसलाइन उत्सर्जन परियोजना उत्सर्जन
गणना: 2,500 टन – 100 टन 2,400 टन CO₂ कमी

चरण 6: सत्यापन (Verification)

एक स्वतंत्र तृतीय पक्ष (Third-Party Auditor) जैसे DNV, SGS, या Bureau Veritas परियोजना स्थल पर जाकर जांच करता है।

  • क्या वास्तव में 10,000 लैंप बांटे गए?
  • क्या लोग उनका उपयोग कर रहे हैं?
  • क्या कोई “रिसाव” (Leakage) तो नहीं हुआ? (जैसे – जिनके पास लैंप हैं, उन्होंने मिट्टी का तेल कम खरीदा, लेकिन कोई और उस मिट्टी के तेल का उपयोग करने लगा या नहीं ?)

चरण 7: क्रेडिट जारी करना (Issuance)
सत्यापन के बाद, मानक निकाय Verified Carbon Units (VCUs) या क्रेडिट जारी करता है, प्रत्येक क्रेडिट = 1 टन CO₂ कमी।

चरण 8: रजिस्ट्री में प्रवेश (Registry)
सभी क्रेडिट एक डिजिटल रजिस्ट्री (जैसे Verra Registry, Gold Standard Registry) में दर्ज होते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि एक ही क्रेडिट दो बार न बिके (Double Counting न हो)।

चरण 9: बिक्री और निरस्तीकरण (Sale & Retirement)
कोई कंपनी यह क्रेडिट खरीदती है, खरीदने के बाद, क्रेडिट को “रिटायर” (Retire) कर दिया जाता है। रिटायर होने का मतलब है कि अब यह क्रेडिट दोबारा नहीं बेचा जा सकता। कंपनी दावा कर सकती है: “हमने अपने उत्सर्जन को ऑफसेट (Offset) कर लिया है”

5. कार्बन क्रेडिट के प्रकार: उत्सर्जन कम करना विरुद्ध कार्बन हटानाः
कार्बन क्रेडिट दो मुख्य श्रेणियों में बंटे हैं:
(A) उत्सर्जन कम करना (Emission Avoidance / Reduction) ये क्रेडिट उन परियोजनाओं से मिलते हैं जो नए उत्सर्जन को होने से रोकती हैं।

उदाहरण कैसे काम करता है;
सौर ऊर्जा संयंत्र कोयला बिजलीघर की जगह सूरज से बिजली कुकस्टोव लकड़ी जलाने की जगह कम धुआं, कम लकड़ी लैंडफिल गैस कैप्चर कूड़े से निकलने वाली मीथेन को जलाना आलोचनाः कुछ लोग कहते हैं कि ये केवल “उत्सर्जन को टालती” हैं, हवा में पहले से मौजूद कार्बन को नहीं हटातीं।

(B) कार्बन हटाना (Carbon Removal / Sequestration)
ये क्रेडिट उन परियोजनाओं से मिलते हैं जो पहले से हवा में मौजूद CO₂ को बाहर निकालती हैं।

उदाहरण कैसे काम करता है

  • वृक्षारोपण (Afforestation) पेड़ हवा से CO₂ सोखकर लकड़ी में बंद करते हैं
  • मृदा कार्बन (Soil Carbon) खेती के तरीकों से मिट्टी में अधिक कार्बन जमा होता है
  • बायोचार (Biochar) पराली को जलाकर कोयला बनाया जाता है, जो मिट्टी में सैकड़ों साल रहता है
  • डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC) मशीनें हवा से सीधे CO, खींचकर जमीन में इंजेक्ट करती हैं (महंगी तकनीक)

महत्वः विज्ञान कहता है कि जलवायु संकट से निपटने के लिए हमें केवल उत्सर्जन कम करना ही काफी नहीं है, बल्कि पहले से मौजूद CO₂ को भी हवा से निकालना होगा।

6. कार्बन क्रेडिट की गुणवत्ता कैसे पहचानें? (गुणवत्ता के 5 सिद्धांत):
सभी कार्बन क्रेडिट समान नहीं होते। एक अच्छा कार्बन क्रेडिट निम्नलिखित मानदंडों पर खरा उतरता है:

1. अतिरिक्तता (Additionality) – सबसे महत्वपूर्णः
प्रश्नः
क्या यह परियोजना कार्बन क्रेडिट की बिक्री के बिना भी होती?
अच्छा उदाहरणः एक दूरदराज के गांव में सोलर माइक्रोग्रिड। बिना कार्बन क्रेडिट के पैसे के, यह परियोजना आर्थिक रूप से संभव नहीं थी।
खराब उदाहरण: एक देश में पवन ऊर्जा परियोजना जहां सरकार ने पहले से ही 50% नवीकरणीय ऊर्जा अनिवार्य कर दी है। यह परियोजना वैसे भी होती।
2. स्थायित्व (Permanence):
प्रश्नः क्या कार्बन हटाना स्थायी है?
अच्छाः भूगर्भीय भंडारण (हजारों वर्ष) मध्यमः वृक्षारोपण (दशकों से सदियों तक, लेकिन आग या कटाई का जोखिम)
खराबः वार्षिक फसलों में मृदा कार्बन (यदि खेती का तरीका बदल जाए तो कार्बन वापस हवा में आ सकता है)

3. रिसाव न होना (No Leakage):
प्रश्नः क्या एक जगह उत्सर्जन कम करने से दूसरी जगह उत्सर्जन नहीं बढ़ा? उदाहरण: एक जंगल को कटने से बचाया गया, लेकिन लकड़हारे पड़ोसी जंगल में चले गए तो यह एक प्रकार का रिसाव है।

4. दोहरी गणना न होना (No Double Counting)
प्रश्नः क्या एक ही कार्बन क्रेडिट दो बार बेचा जा रहा है? अच्छी रजिस्ट्रियां (Verra, Gold Standard) यह सुनिश्चित करती हैं कि एक बार क्रेडिट बिक जाने के बाद वह “रिटायर” हो जाता है और दोबारा नहीं बेचा जा सकता।

5. सह-लाभ (Co-benefits):
प्रश्नः क्या परियोजना से जलवायु के अलावा और भी फायदे हो रहे हैं?
उदाहरण:

  • कुकस्टोव से महिलाओं का स्वास्थ्य बेहतर
  • मैंग्रोव संरक्षण से मछली पकड़ने वालों की आजीविका सुरक्षित
  • सोलर लैंप से बच्चों को पढ़ाई के लिए रोशनी
  • Gold Standard मानक सह-लाभों पर सबसे अधिक जोर देता है।

7. कार्बन क्रेडिट की कीमत कितनी होती है?
कार्बन क्रेडिट की कीमत उसकी गुणवत्ता, प्रकार, और बाजार के आधार पर बहुत भिन्न होती है। प्रकार मूल्य (प्रति टन CO₂)
उदाहरण:
अनिवार्य बाजार (EU ETS) €80-100 (लगभग ₹7,000-9,000) यूरोपीय संघ के कारखानों के लिए अनिवार्य
स्वैच्छिक – नवीकरणीय ऊर्जा $2-5 (लगभग ₹170-400) सस्ते, लेकिन अतिरिक्तता पर सवाल
स्वैच्छिक – कुकस्टोव $5-15 (लगभग ₹400-1,200) सामाजिक लाभ अधिक
स्वैच्छिक – वनरोपण $10-20 (लगभग ₹800-1,600) स्थायित्व का जोखिम
स्वैच्छिक – HFC/NDO विनाश $20-50 (लगभग ₹1,600-4,000) उच्च गुणवत्ता, सुपर प्रदूषक नष्ट करना
स्वैच्छिक – ब्लू कार्बन $30-50 (लगभग ₹2,500-4,000) जैव विविधता के लाभ अधिक

8. कार्बन क्रेडिट की आलोचनाएँ (Criticisms): कार्बन क्रेडिट प्रणाली की कई आलोचनाएँ भी होती हैं:

आलोचना 1: “प्रदूषण करने का लाइसेंस” कुछ लोग कहते हैं कि यह कंपनियों को प्रदूषण कम करने की जगह केवल पैसे देकर “क्लीन” होने का झूठा आश्वासन देती है।

आलोचना 2: “हवाई किले” (Phantom Credits): कई जांचों में पाया गया है कि कुछ परियोजनाओं ने उत्सर्जन में कमी का दावा तो किया, लेकिन वास्तव में कोई कमी नहीं हुई थी।
उदाहरण: 2023 में एक बड़ी जांच में पाया गया कि ज़िम्बाब्वे और केन्या के REDD+ वन संरक्षण परियोजनाओं ने उत्सर्जन में कमी को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया था। 90% से अधिक क्रेडिट वास्तविकता से मेल नहीं खाते थे।
आलोचना 3: “अतिरिक्तता” का झूठः कई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं (जैसे बड़े सोलर फार्म) जो कार्बन क्रेडिट बेच रही हैं, वे आर्थिक रूप से पहले से ही लाभदायक हैं। उन्हें क्रेडिट की आवश्यकता नहीं थी।

आलोचना 4: “ग्रीनवॉशिंग” (Greenwashing) कंपनियां अपने वास्तविक उत्सर्जन को कम किए बिना, सस्ते क्रेडिट खरीदकर खुद को “कार्बन न्यूट्रल” कहती हैं।

9. भारत और कार्बन क्रेडिट:

  • भारत की वर्तमान स्थितिः भारत दुनिया के सबसे बड़े कार्बन क्रेडिट आपूर्तिकर्ताओं में से एक है
  • भारत में सबसे अधिक क्रेडिट नवीकरणीय ऊर्जा, कुकस्टोव, और बायोगैस परियोजनाओं से आते हैं
  • भारत सरकार ने 2023 में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) की घोषणा की
  • 2026 से भारत में भी अनिवार्य कार्बन बाजार शुरू होने की संभावना है

भारत के लिए अवसरः
1. कुकस्टोवः
भारत में अभी भी लाखों परिवार पारंपरिक चूल्हे का उपयोग करते हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा संभावित बाजार है।
2. बायोगासः पशुधन की संख्या के हिसाब से भारत में बायोगैस की अपार संभावना है।
3. मृदा कार्बनः भारत एक कृषि प्रधान देश है। मृदा कार्बन परियोजनाओं से किसानों को अतिरिक्त आय हो सकती है।
4. वनीकरणः नदियों के किनारे, बंजर भूमि पर वृक्षारोपण की बड़ी संभावना।
10. निष्कर्ष: कार्बन क्रेडिट का भविष्यः कार्बन क्रेडिट एक विवादास्पद लेकिन आवश्यक उपकरण है।

सकारात्मक पक्षः

  • यह जलवायु समाधानों के लिए अरबों डॉलर की फंडिंग लाता है
  • यह विकासशील देशों में स्वच्छ ऊर्जा, वन संरक्षण, और सतत कृषि को बढ़ावा देता है
  • यह कंपनियों को अपने उत्सर्जन के लिए जवाबदेह बनाता है
  • नकारात्मक पक्षः गुणवत्ता नियंत्रण की कमी
  • ग्रीनवॉशिंग का खतराः ग्रीनवाशिंग (Greenwashing) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोई कंपनी, संगठन या सरकार अपनी छवि को पर्यावरणीय रूप से अधिक अनुकूल (Eco-friendly) दिखाने के लिए भ्रामक या गलत जानकारी प्रचारित करती है।

यह “पर्यावरण के नाम पर किया गया छलावा” है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्राहकों को यह विश्वास दिलाना होता है कि उनके उत्पाद या नीतियां पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचा रही हैं, जबकि असलियत में ऐसा नहीं होता।

ग्रीनवाशिंग के कुछ सामान्य तरीकेः
अस्पष्ट शब्दों का प्रयोगः “प्राकृतिक”, “इको-फ्रेंडली”, या “हरा” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना जिनका कोई स्पष्ट कानूनी मानक या प्रमाण न हो।
प्रमाण की कमीः यह दावा करना कि उत्पाद पुनर्चक्रण (Recycle) योग्य है या जैविक है, लेकिन उसके समर्थन में कोई वैध प्रमाण पत्र या डेटा न देना।
चुनिंदा तथ्यों को बतानाः उत्पाद के किसी एक छोटे से अच्छे पहलू (जैसे कि पैकेट का कागज़ का होना) को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना, जबकि उत्पाद बनाने की पूरी प्रक्रिया पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक हो। आधिकारिक प्रमाणन (Certification) की तरह लगें, लेकिन वास्तव में वे कंपनी ने खुद ही बनाए हों।
* झूठे लेबल: * ऐसे लोगो या लेबल का उपयोग करना जो देखने में
* अप्रासंगिक दावेः * ऐसी चीज़ों का दावा करना जो कानूनन पहले से ही अनिवार्य हैं (जैसे कि “CFC-free” कहना, जबकि CFCs पहले से ही प्रतिबंधित हैं)। ग्रीनवाशिंग न केवल उपभोक्ताओं को धोखा देती है, बल्कि उन कंपनियों के प्रयासों को भी कमज़ोर करती है जो वास्तव में सतत विकास (Sustainable Development) और जैव-विविधता के लिए काम कर रही हैं। जब कंपनियां संसाधनों का दिखावे के लिए उपयोग करती हैं, तो जलवायु परिवर्तन और वन संरक्षण जैसे वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटक जाता है।

कार्बन क्रेडिट के प्रकारः
कार्बन क्रेडिट एक प्रकार का परमिट (अनुमति पत्र) होता है जो एक टन कार्बन डाइऑक्साइड या उसके समतुल्य अन्य ग्रीनहाउस गैसों को वातावरण में उत्सर्जित करने का अधिकार देता है। जब कोई परियोजना उत्सर्जन कम करती है या वातावरण से कार्बन हटाती है, तो उसे क्रेडिट मिलते हैं, जिन्हें बेचा जा सकता है। कार्बन क्रेडिट परियोजनाओं को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा जा सकता है:
1. उत्सर्जन कम करना (Avoidance/Reduction) – प्रदूषण को होने से रोकना
2. कार्बन हटाना (Removal/Sequestration) – मौजूदा कार्बन को वायुमंडल से बाहर निकालना

नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy): ये सबसे आम प्रकार के कार्बन क्रेडिट हैं। इन परियोजनाओं में कोयला, तेल या गैस से बिजली बनाने की जगह प्राकृतिक संसाधनों से बिजली बनाई जाती है।

ग्रामीण सौर ऊर्जा (Rural Solar): दूरदराज के गांवों में जहां बिजली की पहुंच नहीं है, वहां सोलर पैनल लगाए जाते हैं।

सामान्य नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy): बड़े पैमाने पर पवन ऊर्जा (Wind Energy), सौर ऊर्जा (Solar Energy), या छोटे पनबिजली (Small Hydro) संयंत्र ।

सामुदायिक बायोगैस (Biogas – Community): गांवों में गोबर या जैविक कचरे से बायोगैस प्लांट लगाए जाते हैं। आमतौर पर गोबर खुले में पड़ा रहता था, जिससे मीथेन हवा में चली जाती थी। बायोगैस प्लांट उस गैस को कैद कर लेता है, जिसका उपयोग खाना पकाने के लिए किया जाता है।

कचरा निपटान / अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Disposal / Waste Management) लैंडफिल (कूड़े के ढेर) से निकलने वाली मीथेन गैस को कैद करना। जब कूड़ा सड़ता है, तो उसमें से मीथेन निकलती है। परियोजनाएं पाइप लगाकर इस गैस को इकट्ठा करती हैं और या तो इसे जला देती हैं (फ्लेयरिंग) या बिजली बनाने के लिए उपयोग करती हैं।

फ्यूजिटिव उत्सर्जन (Fugitive Emissions): तेल, गैस या कोयला खदानों से होने वाले रिसाव को रोकना। प्राकृतिक गैस पाइपलाइनों में छोटे-छोटे रिसाव होते हैं, जिनसे मीथेन निकलती है। इन रिसावों को पकड़कर या मरम्मत करके गैस को बचाया जाता है। कोयला खदान मीथेन (Coal Mine Methane – CMM) कोयला खदानों से निकलने वाली मीथेन को पकड़कर बिजली में बदलना।

3. औद्योगिक गैसें (Industrial Gases): ये सबसे मूल्यवान कार्बन क्रेडिट होते हैं क्योंकि इन गैसों को नष्ट करने से जलवायु पर बहुत बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। N₂O विनाश एडिपिक/नाइट्रिक एसिड नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) एक अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। यह नाइलॉन और उर्वरक (फर्टिलाइजर) बनाने के कारखानों से निकलती है।

रेफ्रिजरेंट – एचएफसी (Refrigerant – HFC): एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर में इस्तेमाल होने वाली गैसें, पुराने एसी और फ्रिज में HFC (हाइड्रोफ्लोरोकार्बन) गैस होती है, जिसकी ग्लोबल वार्मिंग क्षमता CO₂ से हजारों गुना अधिक होती है। ये परियोजनाएं पुराने उपकरणों से इस गैस को निकालकर नष्ट कर देती हैं।

4. कार्बन कैप्चर और भंडारण (Carbon Capture & Storage -CCS): यह एक तकनीकी समाधान है जहां CO, को हवा में जाने से पहले ही पकड़ लिया जाता है। सीमेंट कारखानों, स्टील प्लांट या बिजली संयंत्रों से निकलने वाली CO₂ को पाइप के जरिए जमीन के अंदर गहरे चट्टानी भंडारों (जैसे खाली तेल के कुओं या खारे जलभृतों) में इंजेक्ट किया जाता है। यह तकनीक CO, को हजारों सालों के लिए जमीन के अंदर बंद कर देती है।

5. वन एवं भूमि उपयोग (Forestry & Land Use – LULUCF): यह सबसे जैविक और प्राकृतिक तरीका है। इसमें पेड़, मिट्टी और पारिस्थितिकी तंत्र शामिल हैं, वनों की कटाई से बचाव (Avoided Forest Conversion / REDD+)। उन जंगलों की रक्षा करना जिन्हें ताड़ के तेल (Palm Oil) या पशु चारागाह के लिए काटा जाना था।

वनीकरण / पुनर्वनीकरण (Afforestation / Reforestation): वनीकरण (Afforestation): उस जमीन पर पेड़ लगाना जहां 50 साल से जंगल नहीं था। पुनर्वनीकरण (Reforestation) वहां पेड़ लगाना जहां हाल ही में जंगल कटा था। पेड़ बढ़ते समय हवा से CO, सोखते हैं और उसे अपने तने, पत्तियों और जड़ों में संग्रहित कर लेते हैं।

कृषि-वानिकी (Agro-Forestry): खेतों में पेड़ों को एकीकृत करना, कॉफी या कोको के बागानों में छाया देने वाले पेड़ लगाना। इससे कार्बन तो सोखता ही है, साथ ही मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और जैव विविधता (Biodiversity) बढ़ती है।

मृदा कार्बन (Soil Carbon): खेती के तरीकों में बदलाव करके मिट्टी में अधिक कार्बन स्टोर करना। शून्य जुताई (No-Till Farming): जुताई न करने से मिट्टी में मौजूद कार्बन हवा में नहीं निकलता।

कवर क्रॉप (Cover Crops): खाली पड़े खेतों में हरी खाद वाली फसलें उगाना। महासागरों के बाद मिट्टी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कार्बन भंडार है।

ब्लू कार्बन (Blue Carbon): समुद्री तटीय पारिस्थितिकी तंत्र – मैंग्रोव (Mangroves), समुद्री घास (Seagrass), और नमकीन दलदल (Salt Marshes)। ये पारिस्थितिकी तंत्र अमेज़न के वर्षावन की तुलना में 4 गुना तेजी से कार्बन स्टोर करते हैं। ये तूफानों से तट की रक्षा करते हैं और मछलियों के प्रजनन स्थल होते हैं।

चरागाह प्रबंधन (Grassland Management): पशुओं को चराने के तरीके में बदलाव, पारंपरिक तरीके में एक ही जगह पर अधिक चराई से घास की जड़ें कमजोर हो जाती हैं। नियंत्रित चराई से घास गहरी जड़ें बनाती है, जिससे मिट्टी में अधिक कार्बन जमा होता है।

नाइट्रोजन प्रबंधन (Nitrogen Management): सिंथेटिक नाइट्रोजन उर्वरक (यूरिया) के उपयोग को कम करना, अधिक उर्वरक डालने से खेतों से NO (नाइट्रस ऑक्साइड) निकलती है। सटीक मात्रा में उर्वरक डालकर, या जैविक खाद का उपयोग करके इस गैस के उत्सर्जन को रोका जाता है।

7. परिवहन और ईंधन (Transportation & Fuels):
शिपिंग (Shipping): समुद्री जहाजों से होने वाले उत्सर्जन को कम करना। जहाज भारी ईंधन (Bunker Fuel) जलाते हैं। परियोजनाओं में स्क्रबर लगाना, स्वच्छ ईंधन (मेथनॉल, अमोनिया) पर स्विच करना, या जहाजों पर पवन ऊर्जा सहायता (रोटर सेल) लगाना शामिल है।

सार्वजनिक परिवहन (Public Transportation): बस रैपिड ट्रांजिट (BRT) सिस्टम या इलेक्ट्रिक बस फ्लीट का विस्तार। अगर लोग निजी कारों की जगह बसों का उपयोग करते हैं, तो प्रति यात्री प्रति किलोमीटर उत्सर्जन कम होता है। इस अंतर के आधार पर क्रेडिट मिलते हैं।

ईंधन परिवर्तन (Fuel Switching): कारखानों में कोयले की जगह प्राकृतिक गैस या बायोमास का उपयोग करना। तेल के कुओं पर अक्सर अतिरिक्त गैस को जला दिया जाता है (फ्लेयरिंग)। इसे रोककर या उस गैस का उपयोग करके क्रेडिट मिलते हैं।

अपशिष्ट गैस पुनर्प्राप्ति (Waste Gas Recovery): स्टील मिलों में ब्लास्ट फर्नेस से निकलने वाली गैस को कैद करना। आमतौर पर यह गैस हवा में चली जाती है। इसे पकड़कर फैक्ट्री में ही ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है, जिससे बाहर से कोयला लाने की जरूरत कम हो जाती है।

अपशिष्ट से ऊर्जा (Waste to Energy): शहरी ठोस कचरे (Municipal Solid Waste) से ईंधन बनाना। कचरे से RDF (Refuse Derived Fuel) बनाकर सीमेंट उद्योगों में भेजा जाता है।

लेखक : सेवा निवृत
आई.एफ.एस. अधिकारी है

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