हृदयाघात (हार्ट-अटैक) के बढ़ते खतरे के बीच अर्जुनः एक आयुर्वेदिक रक्षा कवच बढ़ता हृदय संकट और अर्जुन से समाधानः युवाओं में हार्ट अटैक के दौर में आयुर्वेद का वरदान

आचार्य बालकृष्ण, स्वामी नरसिंह देव, भास्कर जोशी, राजेश मिश्रा, अनुपम श्रीवास्तव

वर्तमान समय में जिस तीव्र गति से हृदय गति रुक रही है, यह एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य चिंता का विषय बन चुकी है, जो मात्र अब वृद्धों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि युवाओं की धड़कनें रुकने के समाचार सबसे अधिक आ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार विश्व में होने वाली कुल मृत्यु का लगभग 32% कारण हृदय रोग हैं, जिनमें हार्ट अटैक और अचानक होने वाले कार्डियक अरेस्ट प्रमुख रूप से हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 28% मौतें हृदय रोगों के कारण हो रही हैं। NCRB के आंकड़ों के अनुसार 2022 में अचानक मौतों में लगभग 12% वृद्धि हुई, जिनमें अधिकांश मामले हृदय संबंधी थे। इसी प्रकार पिछले दो दशकों में 30-45 आयु वर्ग के युवाओं में हृदय रोगों के मामलों में हार्ट अटैक की घटनाओं में 15-20% तक की वृद्धि चिंताजनक है। इस बढ़ते संकट के बीच, लोगों का विश्वास परम्परागत चिकित्सा तथा आयुर्वेदिक प्राकृतिक उपचारों की ओर बढ़ा है, जिसमे एक ऐसी जड़ी-बूटी जिसे सदियों से हृदय के लिए उपयोगी माना जाता रहा है, वह है ‘अर्जुन-छाल’ यानी ‘अर्जुन वृक्ष (Terminalia arjuna) की छाल, हृदय की ढाल’। वर्तमान में यह प्राचीन औषधि अपने हृदय रक्षी आयुर्वेदिक गुण-धर्मों एवं इसके रासायनिक संघटकों तथा भैषज्य वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है।

Figure 1: Arju Tree (Terminalia arjuna) with temp and bark (Roxb. ex DC.) Wight & Arn.

अर्जुन का परिचयः
अर्जुन, जिसका वानस्पतिक नाम टर्मिनेलिया अर्जुना (Terminalia arjuna) है, जो कॉम्ब्रेटेसी (Combretaceae) कुल का एक विशाल वृक्ष है। ‘टर्मिनेलिया’ शब्द लैटिन के ‘टर्मिनस’ (अंत/सीमा) से आया है, जो पेड़ की डालियों के सिरों पर पत्तियों के गुच्छों की ओर संकेत करता है। वहीं, ‘अर्जुना’ शब्द संस्कृत मूल के उस शब्द से सम्बंधित है जो महाभारत के युद्ध नायक अर्जुन के नाम पर रखा गया है, जो इस वृक्ष की शक्ति और दृढ़ता के प्रतीक के साथ साथ पारंपरिक औषधीय और हृदय-रक्षक क्षमताओं का द्योतक भी है। वैदिक नामकरण प्रणाली में इसे वीरकः अर्जुनः (Voraka arjuna) [W.H.E.] नाम दिया गया है, यहाँ ‘वीरकः’ विशेषण के रूप में प्रयुक्त होकर अर्जुन की शक्ति, स्थिरता और सामर्थ्य को दर्शाता है, जो इस वृक्ष के औषधीय एवं हृदय-रक्षक गुणों के संदर्भ में भी उपयुक्त है।
पौराणिक परिचय / ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व भारत में अर्जुन को एक पवित्र वृक्ष माना जाता है। ऋग्वेद में “अर्जुन” शब्द का उल्लेख (ऋ.वे. 1/122/5) मिलता है। आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथों जैसे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम् में इसका वर्णन है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस वृक्ष की उत्पत्ति उस समय हुई जब भगवान इन्द्र ने वृत्र नामक दैत्य का वध किया। आचार्य चरक ने इसे उदर्दप्रशमन / उदर्दप्रशामक (एलर्जी को कम करने वाला) बताया है। इसकी छाल का उपयोग हृदय रोग, श्वसन रोग, मधुमेह, घाव आदि अनेक व्याधियों में किया जाता है (R.V.1/122/5)। इसके अतरिक्त यह भी मान्यता है कि यह वृक्ष कुबेर के दो पुत्रों से जुड़ी कथा से उत्पन्न हुआ, जिन्हें ऋषि नारद के शाप के कारण यह रूप प्राप्त हुआ।

वनस्पतिक विवरण (Botanical Description)

अर्जुन (Terminalia arjuna) एक विशाल सदापर्णी वृक्ष है, जिसकी ऊँचाई लगभग 18-25 मीटर तक होती है तथा इसका शीर्ष विस्तृत होता है। इसका तना मोटा एवं पादविस्तारित (buttressed) होता है, शाखाएँ क्षैतिज रूप से फैलकर नीचे की ओर झुकी रहती हैं। इसकी छाल मोटी, धूसर या गुलाबी-हरित, चिकनी तथा बड़े बड़े टुकड़ों में सतह तने से अलग होने वाली होती है। शाखाएँ कोमल चिकनी या हल्के पीताभ-भूरे रोमों से युक्त होती हैं।
इसकी पत्तियाँ साधारण, उपविपरीत, दीर्घवृत्ताकार या भालाकार तथा चर्मिल होती हैं, जिनकी लंबाई 10-15 सेमी एवं चौड़ाई 2.5-5.5 सेमी होती है। पत्तियों का अग्रभाग नुकीला तथा आधार गोल या कीलाकार होता है, जबकि किनारे हल्के दन्तुर होते हैं। शिरा-विन्यास जालिकाकार होता है तथा पर्णवृन्त छोटा (3-10 मिमी) होता है, जिसमें 1-2 ग्रंथियाँ पाई जाती हैं।
इसके पुष्प डंठल एवं पंखुड़ी रहित, पीले-सफेद रंग के होते हैं, जो छोटे कणीश (Spike) या शीर्षस्थ गुच्छों (9-13 सेमी) में लगे होते हैं। दलपुंज घंटी के आकार का तथा चिकना होता है, जिसमें 5 त्रिकोणीय दल होते हैं। पुंकेसर 10 होते हैं, जो दो श्रेणियों में व्यवस्थित रहते हैं, तथा अंडाशय अधःस्थ होता है।
इसमें लगने वाले फल ओष्ठिल प्रकार का, अंडाकार- दीर्घवत, 3-6 सेमी लंबा एवं रेशेदार, कठोर तथा पाँच पंखों वाला होता है, जो सूखने पर गहरे भूरे या काले रंग का हो जाता है। पुष्पन काल (Flowering) अप्रैल से जून तथा फलन काल (Fruiting) फरवरी से अप्रैल तक होता है।
प्राकृतिक वास एवं वितरण (Habitat and Distribution) यह एक विशाल वृक्ष है जो भारत में सर्वत्र, उप-हिमालयी क्षेत्र, छोटा नागपुर, मध्य भारत, मध्य प्रांत, ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों और तमिलनाडु में पाया जाता है। विश्व में यह म्यांमार, श्रीलंका और मॉरीशस के वनों में पाया जाता है। यह वृक्ष भारत में लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में वृद्धि करता है, विशेष रूप से उपजाऊ, उपजाऊ दोमट तथा लाल लैटराइट मिट्टी इसके लिए अनुकूल होती है। यह विशेष रूप से आर्द्र और उपजाऊ मिट्टी में अच्छी तरह विकसित होता है।
“श्रीलङ्कायां प्रजायेत त्वर्जुननामपादपः। ब्रह्माभिधानदेशे च भारतस्य विशेषतः। भूयिष्ठभागजातेऽपि तथा हिमवतः खलु । उपकण्ठस्थभागेषु छोटानागपुरेऽपि च। मध्यभारतभूमीषु कर्णाटे च उत्कलेऽपि वै। तमिले मरहट्टे च सर्वथा सम्प्रजायते ॥” (सौमित्रेय महोदधिः १-३)

आयुर्वेदिक गुणः
आयुर्वेद के अनुसार औषधीय रूप में मुख्यतः इसकी तने की का छाल में रस कषाय, गुण रुक्ष एवं लघु, वीर्य शीत तथा विपाक कटु होता है। इसे हृदय-संरक्षक (cardioprotective), प्लेटलेट-रोधी (antiplatelet), वसा-नियंत्रक (hypolipidemic), रक्तचाप-नियंत्रक (hypotensive) तथा रक्तशर्करा-नियंत्रक (hypoglycemic) माना गया है। चरक, सुश्रुत और वाग्भट्ट के अनुसार वर्गीकरणः चरक-उदारदाप्रमाण, कषाय स्कंध; सुश्रुत न्यग्रोधदि, सालसारादिः वाग्भट-विरतर्वादि, न्यग्रोधदि गण, आसनादि गण

आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन (Modern Scientific Studies)

रासायनिक घटक एवं भैषज्य गुण (Phytoconstituents and Pharmacological properties)
अर्जुन छाल में औषधीय गुणों युक्त अनेक जैव सक्रिय रासायनिक यौगिक पाए जाते हैं, जिनमे प्रमुख रूप से ट्राइटरपेनॉइड्स जैसे अर्जुनिक अम्ल एवं अर्जुनोलिक अम्ल, अर्जुनेटिन (arjunetin), अर्जुग्लुकोसाइड आदि यौगिक अनॉक्सीकारक क्षमता में वृद्धि कर जो लिपिड पेरोक्सीडेशन को रोकने में सहायक होते हैं और मायोकार्डियल नेक्रोसिस तथा फाइब्रोसिस को कम करने के लिए JNK/c-Jun फॉस्फोराइलेशन को बाधित करते हैं। फ्लेवोनोइड्स (जैसे, अर्जुनोलोन, ल्यूटोलिन) फ्री रैडिकल्स को नष्ट करते हैं, एंडोथेलियल डिसफंक्शन में सुधार करते हैं और नाइट्रिक ऑक्साइड सम्बंधित रक्त की धमनियों के आकर में वृद्धि कर वासोरेलेक्सेशन एवं प्लेटलेट एकत्रीकरण को रोककर एंटी-थ्रोम्बोटिक गुण और वासोडिलेशन (रक्त वाहिकाओं के फैलाव) के माध्यम से रक्तचाप कम करने वाले (Hypotensive) प्रभाव भी दिखाते हैं । इसके अतिरिक्त टैनिन्स तथा विभिन्न ग्लाइकोसाइड्स योगिक और खनिज तत्व जैसे कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं जिंक अदि भी इसके महत्वपूर्ण घटक हैं। इस प्रकार, अर्जुन छालमें निहित इन सभी विशिष्ट रसायनों के बहुआयामी प्रभाव मिलकर, इस वृक्ष को एक शक्तिशाली हृदय-रक्षी क्षमता का प्रामाणिक उदहारण प्रस्तुत करते हैं (Dwivedi, & Chopra, 2014)
इसके अतिरिक्त विश्व भर की प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित शोध परिणामों (In vitro & In vivo) में यह ज्ञात हुआ है कि अर्जुन वृक्ष की छाल सहित अन्य भागों में विशिष्ट फार्माकोलॉजिकलगुण जैसे हृदय-संरक्षी, अनॉक्सीकारक (Cardioprotective and antioxidant), वसा-नियंत्रक प्रभाव (Hypolipidemic effect), सूजन-रोधी (Anti-inflammatory), रक्तस्तंभक (Hemostyptic activity) तथा कैंसर-रोधी (Anticancer activity) पाए गए हैं। साथ ही अर्जुन छाल के सार में कुल कोलेस्ट्रॉल को कम करनें तथा HDL (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) में वृद्धि करने की क्षमता पाई।

विषाक्तता और दुष्प्रभाव सम्बन्धी अध्ययन
क्लिनिकल स्टडीज़ से पता चला है कि अर्जुन छाल की 1 से 2 g प्रति दिन की डोज़ को सबसे उपयुक्त माना गया है, खासकर CAD वाले रोगियों के लिए। नैदानिक अध्ययनों में, इसे 2 साल से ज़्यादा समय तक प्रयोग करने के बाद भी रक्त, लिवर, मेटाबॉलिज़्म या किडनी से समबन्धित किसी प्रकार की विषाक्तता (टॉक्सिसिटी) की कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। हेमाटोलोजी (रक्त) और बायोकेमिकल जाँचों से पता चला कि इसके एक्सट्रैक्ट का कोई भी विषैले प्रभाव या मृत्युदर प्रदर्शित नहीं हुई । पैथोलॉजिकल तौर पर भी कोई घातक बदलाव नहीं देखे गए।

औषधीय उपयोग (Medicinal Uses)
अर्जुन का प्रयोग आयुर्वेदिक चिकित्सा में अत्यंत व्यापक है, जहाँ इसे 103 आंतरिक तथा 22 बाह्य औषधीय योगों में सम्मिलित किया गया है। आचार्य वाग्भट्ट ने सर्वप्रथम अर्जुन की तने की छाल के चूर्ण के औषधीय उपयोग की अनुशंसा की थी। आयुर्वेद, सिद्ध तथा यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है। विशेष रूप से यह हृदय संबंधी रोगों के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है। अथर्ववेद में इसका उल्लेख मिलता है तथा आचार्य वाग्भट्ट ने अपनी प्रसिद्ध कृति अष्टांग हृदयम् में सर्वप्रथम इसके हृदय रोगों में उपयोग का वर्णन किया, जिसकी पुष्टि बाद में चक्रदत्त और भावमिश्र द्वारा भी की गई।
बाह्य उपयोग में यह स्त्रीरोग, चर्मरोग, उपदंश तथा बालरोगों में उपयोगी है, जबकि आंतरिक रूप से यह हृदय रोग, रक्तपित्त, मूत्रकृच्छ, प्रमेह, शूल, स्त्रीरोग तथा अश्मरी जैसे रोगों के उपचार में लाभकारी सिद्ध होता है। विशेष रूप से हृदय रोग, प्रमेह तथा उपदंश में इसके प्रयोग की संख्या अधिक पाई गई है। इसके अतिरिक्त यह अग्निमांद्य, अजीर्ण, कास (खाँसी) तथा अम्लपित्त जैसे विकारों में भी उपयोगी माना जाता है।

चिकित्सा पद्धति में, इसके पेड़ की छाल का काढ़ा मूत्र मार्ग के संक्रमण के उपचार हेतु दिया जाता है, जबकि इसकी छाल से दूध में निर्मित काढ़े का प्रयोग हृदय संबंधी रोगों में लाभकारी माना गया है। वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि की है कि यह रक्त के कुल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है और HDL (उत्तम कोलेस्ट्रॉल) को बढ़ाता है।

मात्रा एवं उपयोग विधि (Preparations and Medicinal Uses)
1. श्वसन संबंधी विकार
अर्जुन की छाल का पाउडर वासा (मालबार नट) के रस, घी, शहद और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करने से तपेदिक (TB), खांसी और रक्तस्राव (hemorrhages) में आराम मिलता है।
2. हृदय रोग
अर्जुन की छाल को दूध में उबालकर चीनी या अन्य औषधीय जड़ी-बूटियों (जैसे लघु पंचमूल, बला या मुलेठी) के साथ सेवन करना हृदय संबंधी बीमारियों के लिए लाभदायक है।
अर्जुन की छाल का पाउडर घी, दूध या गुड़ मिले पानी के साथ लेने से हृदय रोग, पुराना बुखार और रक्तपित्त (रक्तस्राव संबंधी विकार) को दूर करने में मदद मिलती है।
गेहूं का आटा और अर्जुन की छाल का पाउडर दूध, घी, शहद और चीनी के साथ मिलाकर सेवन करना हृदय की विभिन्न स्थितियों के लिए लाभदायक है।
अर्जुन की छाल का पाउडर दूध के साथ नियमित रूप से सेवन करने से हृदय रोग, खांसी, अस्थमा और वात-संबंधी विकारों में आराम मिलता है; इसके अलावा, यह शरीर को सुदृढ़ तथा दीर्घायु प्रदान करता है।
3. पेट (उदर) संबंधी विकार
अर्जुन की छाल का सेवन अन्य औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर करना रक्तातिसार (खूनी दस्त) के लिए लाभकारी है। अर्जुन से प्राप्त क्षारीय भस्म (Ash) के सेवन करने से ग्रहणी (पुरानी पेचिश) में आराम मिलता है। अर्जुन के काढ़े का सेवन उदावर्त (वात की ऊपर की ओर गति/उल्टी पेरिस्टालसिस) और मूत्र रुकने से संबंधित समस्याओं के लिए लाभदायक है।
4. गुदा-मलाशय संबंधी विकार
गुदा क्षेत्र को अर्जुन की छाल के काढ़े से धोने या साफ करने से बवासीर (hemorrhoids) के उपचार में लाभकारी है। अर्जुन घृत (अर्जुन छाल युक्त घी) आंतरिक रक्तस्राव और बवासीर के उपचार में उपयोगी है।
5. मूत्र और गुर्दे संबंधी विकार
अर्जुन की छाल का काढ़ा पीना मूत्र अवरोध (Anuria) के मामलों में लाभदायक है। अन्य औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ निर्मित अर्जुन का काढ़ा सामान्य मूत्र विकारों, प्रमेह (Diabetes) और गोनोरिया के के उपचार में उपयोगी होता है।
6. प्रजनन संबंधी विकार
अर्जुन की छाल के काढ़े का उपयोग प्रसव के बाद उत्पन्न होने वाली जटिलताओं और स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए किया जाता है।
अर्जुन और चंदन से बना काढ़ा धातु रोग (Fertility related complications) के उपचार में होता है।
7. हड्डी और मांसपेशियों के विकार
अर्जुन की छाल को दूध के साथ लेने से हड्डियों के टूटने व हड्डियों के अपनी जगह से खिसकने (dislocation) के मामलों में भी लाभदायक होता है।
8. त्वचा के विकार
अर्जुन की छाल के काढ़े से स्नान करने या उसे पीने से कुष्ठ रोग (leprosy) में लाभदायक होता है। अर्जुन की छाल का पेस्ट चेहरे के दाग-धब्बे और काले धब्बे (melanosis) दूर करने में सहायक होता है।
9. सामान्य बीमारियाँ
अर्जुन की छाल का प्रयोग रक्तपित्त (खून से जुड़े विकार) के उपचार में किया जाता है। अन्य जड़ी-बूटियों के साथ लेने पर यह तपेदिक, खांसी और सामान्य कमजोरी के मामलों में लाभदायक सिद्ध होता है।
अस्वीकरण
इस लेख में दी गई जानकारी केवल शैक्षिक और सामान्य जागरूकता के उद्देश्यों के लिए प्रदान की गई है। यहाँ वर्णित औषधीय उपयोग पारंपरिक और उपलब्ध वैज्ञानिक स्रोतों पर आधारित हैं। बिना चिकित्सकीय परामर्श के किसी भी दवा का उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

प्रमुख आयुर्वेदिक उत्पादों के रूप में अर्जुन छाल का प्रयोग पारम्परिक चिकित्सा पद्धति में अर्जुन का उपयोग अनेक व्यावसायिक आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण में किया जाता है, जो निम्नलिखित हैं-

  • अर्जुनारिष्ट (Arjunarishta) – हृदय को बल देने, रक्त संचार सुधारने तथा उच्च रक्तचाप में उपयोगी।
  • अर्जुन चूर्ण (Arjuna Churna) – छाल का पाउडर, जो हृदय रोग, खाँसी और पाचन विकारों में प्रयोग होता है।
  • अर्जुन घृत (Arjuna Ghrita) – घी आधारित तैयारी, जो हृदय रोगों और कमजोरी में लाभकारी है।
  • अर्जुन क्वाथ (Arjuna Kwath) – काढ़ा रूप में उपयोग, हृदय एवं रक्त संबंधी विकारों में सहायक।
  • अर्जुन क्षीरपाक (Arjuna Ksheerapaka) – दूध के साथ निर्मित, विशेष रूप से हृदय रोगों में उपयोगी।
  • संयोजन (Polyherbal Formulations)

निष्कर्ष (Conclusion)
इस लेख में वर्णित समस्त जानकारियों के आधार पर, यह कहा जा सकता है कि अर्जुन (Terminalia arjuna) एक बहुआयामी और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित औषधीय वृक्ष है, जिसकी छाल का प्रयोग हृदय रोगों के उपचार हेतु अत्यंत महत्वपपूर्ण है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों से लेकर आज के फ़ार्माकोलॉजिकल अध्ययनों में इसके हृदय-रक्षी एवं अन्य चिकित्स्कीय गुणों को पूरी तरह से सिद्ध किया जा चुका है। इसमें पाए जाने वाले विभिन्न फ़ाइटोकेमिकल्स कई आयुर्वेदिक दवाओं में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जा रहे हैं।
वर्त्तमान शोध प्रकाशनों के अनुसार अर्जुन का प्रयोग चिकित्सा के साथ साथ अद्यतन शोध कार्यों जैसे ग्रीन नैनोटेक्नोलॉजी, नैनोपार्टिकल बनाने और आधुनिक दवा फ़ॉर्मूलेशन जैसे क्षेत्रों में भी बढ़ रहा है। यद्यपि किसी भी औषति की शरीर में इसके असर को बढ़ाने (बायोअवेलेबिलिटी), क्लिनिकल ट्रायल के साथ साथ और सुरक्षित एवं प्रभावी नैनो-मेडिसिन बनाने के लिए और ज़्यादा बड़े पैमाने पर शोध की आवश्यकता होती है।
अतः अर्जुन-वृक्ष पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का एक सम्मिश्रण है, जो भविष्य में हृदय रोगों और दूसरी जटिल बीमारियों के उपचार में एक असरदार, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल औषधीय विकल्प के तौर पर अहम भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।

SOURCE
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Hegde, Shrikanth N. 2026 Sudden Death in the Young in India in the Postpandemic Period: Time for Action Sudden Death in the Young in India in the Postpandemic Period: Time for Action
Menon GR, et al., (2022). Burden of non-communicable diseases and its associated economic costs in India. Social Sciences & Humanities Open.
Priyanka et al.,, *Young Hearts under Attack: The Alarming Increase in Heart Problems among Indian Youth
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Soni, N., & Singh, V. K. (2019). Trends in Applied Sciences Research.
Tahir, et al., (2025). Nutritional composition, phytochemical profile, extraction methods of bioactive components, and health benefits of Terminalia arjuna bark. eFood, 6(2), e70038. Tsao CW, et al. Heart Disease and Stroke Statistics-2022
Update: A Report from the American Heart Association. Circulation.

1. Department of Allied Sciences, University of Patanjali, Patanjali Yogpeeth, Haridwar, Uttarakhand 249 405, India
2. Patanjali Herbal Research Division, Patanjali Research Foundation, Haridwar, Uttarakhand 249 405, India
3. Patanjali Bhartiya Ayurvigyan Evam Anusandhan Sansthan, Haridwar, Uttarakhand 249 405, India

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