प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए आचार संहिता

डा. कपूरमल जैन

प्रकृति और पर्यावरण को खतरा हमारे लालच और स्वार्थ से भरी गतिविधियों के कारण है। हमारे पास बुद्धि तो है लेकिन विवेक की कमी है। विवेक रहित मनोवृत्ति पर अड़े रहना हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसे बदलना सबसे बड़ी चुनौती है। हमें भावी पीढ़ियों के बारे में सोचना है। यह हम प्रकृति-मित्र, वृक्ष-मित्र, जल-मित्र, वायु-मित्र और मृदा-मित्र बनकर कर सकते हैं। जरूरत दृढ़ संकल्प और ठोस कदम उठाने की है। हमारी पृथ्वी जैव विविधताओं और प्राकृक्तिक संसाधनों से भरपूर एक सुन्दर ग्रह है। लेकिन, आज पर्यावरण की गिरती गुणवत्ता और प्राकृतिक संसाधनों की घटती उपलब्धता के कारण गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। जैव विविधता को बचाए रखना हमारे लिए चुनौती बन गया है। जैव विविधता के सुरक्षित रहे बिना हमारा अपना अस्तित्व भी गहरे संकट में आ गया है। आज हमारी अवांछित पर्यावरण-विरोधी गतिविधियों और हस्तक्षेप के कारण धरती गरम होने लगी है। हवा और पानी जहरीले बन रहे हैं। प्राकृतिक चक्त गड़बड़ाने लगे हैं। इससे पृथ्वी का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा है। जैव विविधता को लगातार पोषित करते रहना और इसे बचाए रख पाना संभव नहीं हो पा रहा है। ऐसे में हमें स्वयं चेतने तथा व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर आगे आ कर कदम उठाने की आवश्यकता है। लेकिन हमारे सार्थक कदम तभी उठेंगे जब हम विचार करेंगे कि मालिकाना व्यवहार करते हुए हमने प्रकृति, वृक्ष, वायु, जल और मृदा आदि की गुणवत्ता का बहुत हास किया है। प्राकृक्तिक संसाधनों का शोषण की हद तक दोहन किया है। अतः हमें अपने नजरिए में बदलाव लाते हुए मित्रता का हाथ बढ़ाना होगा।

मित्रता की राह में बाधा
जब हम मित्र के रूप में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण या इनकी गुणवत्ता की रक्षा करने के लिए निकलते हैं तो हमारे सामने वे लोग आने लगते हैं जो जानकर सोए होते हैं या जिद्दी किस्म के होते हैं। हमें कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं, जो अत्यधिक स्वार्थी और लालची होते हैं। जिन्हें भावी पीढ़ियों की चिंता नहीं होती। इनके अलावा हमें वे लोग भी मिलते हैं जो अपने मन-विरुद्ध बात होने पर अपनी सारी भड़ास प्रकृति और पर्यावरण को भारी क्षति पहुँचाने में जरा भी संकोच नहीं करते। निश्चित ही ऐसे लोग संख्या-बल में कम होते हैं, लेकिन पर्यावरणी समस्या हल न होने देने में इनका बहुत अधिक योगदान होता है। ये लोग बेखौफ नदियों से रेत का खनन करते हैं। वन और खनिज सम्पदा लूटते हैं। खेतों में खड़ी फसलों और जंगलों को जलाते हैं। ये अपनी फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुँए को हवा में घोलते हैं तथा गंदे जल को नदियों में मिलाते हैं। इन लोगों की वजह से बिगड़ रहे हालात के कारण ही आज धरती के बुखार और जलवायु परिवर्तन, जैव-प्रजातियों के विलुप्तीकरण, पर्यावरणी गुणवत्ता के ह्रास से उपजे गहरे संकटों के पदचाप सुनाई देने लगे हैं। अतः ऐसे लोगों से प्रकृति और उसके घटकों को बचाना बड़ी चुनौती है।

कैसे करें मित्रता ?
हमें समझना होगा कि प्रकृक्ति, वायु, जल, मृदा (मिट्टी) हमारी तरह बोल नहीं सकते। फिर इनके साथ ‘मित्रता’ कैसे की जा सकती है? यह सही है। लेकिन, विचार करें तो हम पाते हैं कि ‘वायु’ और ‘जल’ के साथ ही कई जीवनोपयोगी उत्पाद प्रकृति हमें लगातार देती रहती है। इस तरह हमारे जीवन के लिए अनिवार्य वायु, जल, वृक्ष और मृदा जैसे घटकों से संरचित दानी प्रकृति में हमसे आदर्श दोस्ती करने और निभाने के सारे गुण विद्यमान हैं। विचार सिर्फ हमें करना है। क्योंकि हम अपना ‘दिल छोटा’ और’ दिमाग बड़ा’ करते जा रहे हैं। जैसे जैसे हमारा दिमाग बड़ा (चालाकी भरे रास्ते खोजने वाला) बनने लगता है, हम ‘व्यावसायिक’ और ‘ईको शत्रु’ माइण्डसेट वाले बनने लगते हैं। इस माइण्डसेट के साथ हम’ असंवेदनशील’, ‘स्वार्थी’ और ‘लालची’ बनने लगते हैं। हमारा ऐसा होना ही निःस्वार्थ पक्की दोस्ती के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। आज अपने इस माइण्डसेट को ठीक करना ही हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है। प्रकृति और उसके घटकों से दोस्ती करने के पहले हमें आत्मावलोकन और आत्म विश्लेषण कर जानना होगा कि दोस्ती करने के लिहाज से आखिर हम कहाँ ठहरते हैं। और, अगर सचमुच ही हम दोस्ती करना और निभाना चाहते हैं तो हमें प्रकृक्ति मित्रों, वृक्ष-मित्रों, वायु-मित्रों, जल-मित्रों और मृदा-मित्रों के समूह बनाने होंगे जो अपने ईको दोस्ताना मनोवृत्ति के साथ स्वनिर्धारित आचार संहिता का पालन करें। आइए। अब हम विभिन्न समूहों द्वारा पालन करने के लिए आचार संहिता पर विचार करते हैं।

प्रकृति-मित्र
प्रकृक्ति जैविक और अजैविक संसाधनों के स्रोत के रूप में हमारे सामने असीम विस्तार लिए हुए है। यह सभी प्राणियों की शरणस्थली है। यहाँ हमें ‘जैव विविधता’ के दर्शन होते हैं। कृषि, स्वास्थ्य, व्यापार, उद्योग आदि क्षेत्रों में इसके लाभ अवर्णनीय हैं।
हमारे आसपास मंडराते कौए, गिद्ध जैसे पक्षी और तिलचट्टे, छिपकली, चींटियों जैसे प्राणी सफाई कर्मचारी की तरह काम कर धरती को स्वच्छ रखते हैं। जैव विविधता के अंतर्गत आने वाली प्राकृतिक वनस्पति बारिश के पानी के लिए स्पंज जैसा काम करती है। यह जलीय चक्र को बनाए रखने और सतही जल पर नियंत्रण प्रदान करती है। सूखे और बाढ़ के समय प्रतिरोधक का कार्य करती है। यह भूमि में नमी, पोषक तत्वों आदि को बनाए रखने में मददगार होती है। यह भूमि कटाव को रोकती है। इससे मिलने वाला जैविक (कार्बनिक) कचरा जीवाणुओं की गतिविधियों को बढ़ाने और जारी रखने में मदद करता है। यह आज के विज्ञान जन्य ज्ञान से निकला तथ्यों पर आधारित सच है, जिससे हम परिचित हैं। लेकिन अवकाश और फु. सत के क्षणों में दिल बहलाने और तरोताजा बनाने में जैव विविधता से भरी प्रकृक्ति के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।
प्रकृति से जुड़ा ज्ञान हमारे लोक जीवन में दिखाई देता है। यह हजारों सालों के अनुभव और प्रत्यक्ष प्रेक्षणों पर आधारित ज्ञान है। यह ज्ञान पौराणिक कथाओं, लोकवार्ताओं और किंवदन्तियों में प्रतीकात्मक रूपकों के रूप में कहावतों, मुहावरों, लोक कथाओं, पहेलियों आदि में विद्यमान है।
जगदीश चंद्र बसु और उनके बाद हुई खोजों ने प्रकृक्ति के बारे में जो रहस्योद्घाटन किए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। उसे भी सुख-दुख का अहसास होता है और वह भी भावनाओं को समझती है तथा अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करती है। अतः प्रकृक्ति और उसके घटक मात्र भौतिक वस्तु और संसाधन नहीं हैं, जिनका जितना चाहें उतना और जब चाहें तब हम निर्ममतापूर्वक शोषण कर सकते हैं। बल्कि वे इससे अलग हैं, जिनका अस्तित्व में रहना अनिवार्य है। अतः हमें प्रकृक्ति के प्रत्ति अपने वर्तमान ‘मालिक’ वाले नजरिए को बदलकर ‘मित्रता’ वाले नजरिए को अपनाना होगा। हमें सोचना होगा कि हमारी तरह ही पेड़-पौधों के रूप में रची-बसी प्रकृति का भी अपना छिपा हुआ’ जीवन’ है। दोस्ती के लिए हम प्रकृक्ति को एक वृहद शरीर के रूप में मान सकते हैं और कल्पना कर सकते हैं कि जिस तरह हमारे शरीर में खून प्रवाहित होता है, उसी तरह प्रकृति में हवा और पानी प्रवाहित होते हैं। अतः हम अपने-अपने स्तर पर तथा अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार अपनी प्रत्येक गतिविधियों की मॉनीटरिंग कर प्रक्ति को बचाने और उसके संरक्षण के लिए अपनी स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से ‘प्रकृति-मित्र’ बनते हुए स्वयं के पालन हेतु आचार संहिता तैयार कर निम्नलिखित ठोस कदम उठा सकते हैं।
1. दिल से महसूस करें कि प्राकृतिक संसाधनों को सहेजने और बचाने की जिम्मेदारी हम सबको है।
2. पालक अपने बच्चों को प्रकृति के बीच ले जाएँ।
3. दादा-दादी अपने पोते-पोतियों और नाना-नानी अपने नाती-नातिनों में कहानियों के माध्यम से प्रकृक्ति-संस्कार डालें।
4. शिक्षक पढ़ाते समय प्रक्ति को ध्यान में रखें और अपने विद्यार्थियों को प्रकृति के सामीप्य के लिए प्रेरित करें।
5. वरिष्ठ नागरिक पार्क में बच्चों से बात करें और उन्हें पर्यावरण प्रेमी बनाने में अहम भूमिका निभाएँ।
6. हम अपने वर्तमान में अपनाए गए पर्यावरण-रोधी विकास के मॉडल को बारीकी से समझें तथा विचार करें कि अब तक के विकास में पर्यावरणी पहलुओं को नजरअंदाज करना कितना महँगा पड़ा है?
7. हम महसूस करें कि धरती पर उपलब्ध प्राक्तिक संसाधन असीमित नहीं हैं। हमारी कई विकास गतिविधियाँ स्वयं हमारे पर्यावरण एवं अस्तित्व के हित में नहीं हैं। उन्हें नियंत्रित करें तथा प्रकृक्ति के आसक्तिपूर्ण भीग की घातक प्रवृत्ति को त्यागें।
8. प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करने वालों को भावी पीढ़ियों का बास्ता देते हुए प्रकृक्ति और मनुष्य के बीच अंतरसंबंधों को मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाएँ।
9. भारतीय संस्कृति के सूत्र वाक्य ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘वसुधैव कटुम्बकम्’ हैं। इनमें प्राणी मात्र के जीने के अधिकारों के संदेश छिपे हैं। इन्हें स्वयं समझें तथा औरों को भी समझाएँ।
10. सार्थक और सकारात्मक भावों के साथ प्रकृति से जुड़ें।
11. प्रक्ति से मजबूत संबंध स्थापित करें। उसके दानी स्वभाव एवं सेवा भाव को समझें तथा अपने व्यवहार को तदनुरूप परिमार्जित करें।
12. प्रकृक्ति को ध्यान से देख कर रोमांच महसूस करें। इसकी हर गतिविधि दाँतों तले उंगली दबाने को बाध्य कर सकती है, बशर्ते हम उसे देखने को जिज्ञासु दृष्टि तिकसित करें।
13. आज हमें धरती पर कई प्राकृतिक चक्र गड़बड़ते हुए मिल रहे हैं। हजारों वर्षों से सुरक्षित बची रही भोजन श्रृंखला खतरे में पड़ी दिखने लगी है। इससे प्राकृतिक चैविक जाल कमजोर होने लगा है। कई प्रजातियाँ विलुप्त होने लगी हैं। कई विलुप्ति के कगार पर पहुँच रही हैं। पहले मोर, कौए, चिड़ियाँ, तितलियाँ आदि बहुतायत में नजर आते थे, जो अब गायब हो चले हैं। इन सबका अपना महत्व है। अतः जैव विविधता का सम्मान करें। इनको बचाने में सहयोग प्रदान करें।
14. हम अपने आसपास फल-फूल रही प्राकृक्तिक वन सम्पदा को नष्ट न करें। जिस क्षेत्र में जो पेड़-पौधे होते हैं उनसे वे रसायन स्थानीय हवा में फैलते हैं, जिनकी वहाँ के लोगों को जरूरत होती है। इस वातावरण में नहीं रहने से लोग इनसे मिलने वाले स्वाभाविक लाभों से बंचित रह जाते हैं। इससे वे बीमार पड़ जाते हैं। क्षेत्र-विशेष के हिसाब से प्रकृक्ति जिस पर्यावरण को बनाती है, उसमें अगर मानवीय हस्तक्षेप कम से कम हो तो हमें स्वस्थ बनाए रखने की तासीर होती है। प्रकृति की इस जबरदस्त हीलिंग क्षमता की महसूस करें।
15. अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखें तथा लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करें।
16. परिवेश की सुंदरता मन पर बहुत अच्छा प्रभाव डालती है। अतः फूल-पत्तों को न तोड़ें।
17. लोभ और स्वार्थ से अपने मन-मस्तिष्क को प्रदूषित होने से बचाएँ। विवेक दृष्टि जगाएँ।
18. चाहे जो कार्य कर रहे हों, प्रकृक्ति को सदैव अपने ध्यान में रखें।
19. प्रदूषित मानसिकता वाले अपने परिचित और आसपास रह रहे लोगों की अंतरात्मा को जगाएँ।
20. अपना गुस्सा और माँग जायज हो सकते हैं। लेकिन, इसके लिए प्राकृतिक सम्पदा और लोक सम्पदा को आग के हवाले कर देना कैसे न्यायसंगत ठहराया जा सकता है? पर्यावरण विरोधी ऐसी गतिविधियों से खुद बचें और दूसरों को रोकें।
21. कर्मकाण्ड और अंधविश्वास में उलझने के बजाए निहितार्थों को समझें। यह न भूलें कि भारतीय समाज के जीवन मूल्य पर्यावरण के संरक्षण के साथ जुड़े हुए हैं। अतः लोक संस्कृति में प्रचलित क्रियाकलापों और कर्मकांडों को अंधविश्वास और अवैज्ञानिक घोषित करने के पहले, इनमें छिपे पर्यावरणी तथ्यों और विज्ञान को बाहर लाने का प्रयास करें। इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने-समझाने की दिशा में कदम उठाएँ।
22. परम्पराओं के पीछे छिपे विज्ञान और पर्यावरणी महत्व को समझते हुए इन्हें स्वयं अपनाने, जारी रखने या त्यागने पर विचार करें।
23. भूकम्प, सुनामी जैसी प्राकृक्तिक आपदाओं की शुरुआत के पहले प्रकृक्ति कुछ विशेष संकेत प्रेषित करती हैं जिन्हें चूहे, साँप, हाथी जैसे कई जीव-जंतु पहचान लेते हैं, जिन्हें उनके व्यवहार में अचानक नजर आने वाले परिवर्तनों से पहचाना जा सकता है। ये जानकारियाँ हमारे पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान में छिपी हुई हैं। इन अनुभव जन्य जानकारियों को लोगों तक पहुँचाएँ ताकि समय रहते हानि को न्यूनतम किया जा सके।
24. भारत उत्सवधर्मी देश है। लोगों को उत्सवों के दौरान झाँकियों में ईको मित्र मूतियाँ प्रतिष्ठित करने हेतु प्रोत्साहित करें।
25. भावी पीढ़ियों को प्राक्तिक संसाधनों और गुणवत्तापूर्ण पर्यावरण के रूप में बेहतर विरासत देने का संकल्प लें।
26. पर्यावरण विरोधी चल रहे कामों के विरोध में आवाज उठाने में हिचकें नहीं, यह सोच कर कि मुझे क्या करना है ?
27. प्राकृतिक संसाधनों और उनसे निर्मित सामग्रियों का किफायती इस्तेमाल करें।
28. प्राकृक्तिक चक्रों और जैविक जालों को नुकसान नहीं पहुँचाएँ।
29. उन सरकारी और गैर-सरकारी कार्यों पर नजर रखें जो प्रकृक्ति और पर्यावरण के दुश्मन हों तथा संबंधितों को अवगत कराएँ।
30. सभी जीव-जंतु प्रकृति के जैविक जाल के अंग हैं, अतः इनकी रक्षा करने का संकल्प लें। याद रखें कि कोई भी जीव-जंतु हमें तभी नुकसान पहुँचाते हैं जब हम उन्हें नुकसान पहुँचाते या छेड़ते हैं।
31. सार्वजनिक कार्यक्रमों में अधिक शक्ति के लाउड स्पीकर का प्रयोग न करें। तेज आवाज से प्रकृति में निवास कर रहे जीव-जंतुओं और पशु-पक्षियों में बेचैनी बढ़ती है। दीवाली के समय अपनी गलियों में कुत्तों को परेशान एवं भयग्रस्त भागते-छिपते देखा जा सकता है। विदित हो कि ८० डेसिबल से अधिक के शोर प्रदूषण के सांघातिक प्रभाव से अनिद्रा, घबराहट, अपच, रक्तचाप, बधिरता आदि बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। इससे हमारी जीवन शक्ति क्षीण होती जाती है।
32. ठंड में सूट जरूरी हो सकता है, लेकिन गरमी में नहीं। अतः अपना ड्रेस कोड समयानुकूल तय करें।
33. घरों में हवा और प्रकाश की प्राकृतिक व्यवस्था पर जोर दें, क्योंकि कृत्रिम व्यवस्था पर्यावरण की गुणवत्ता में कमी लाती है। 34. दरवाजे के पास इस तरह बैठ कर सुबह अखबार वगैरह पढ़ें ताकि कृत्रिम रोशनी की आवश्यकता ही न पड़े।
35. परिवार में साथ खाने, अपने कमरों तथा कार को शेयर करने, साथ बैठ कर टीवी आदि देखने, खुशी खुशी साथ बैठ कर बातें करने की आदत डालें। ये प्रत्ति व्यक्ति होने वाली ऊर्जा खपत को अत्यंत कम कर देते हैं।
36. विद्युत ऊर्जा को जीवाश्म ईंधनों या यूरेनियम जैसे प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से अथवा नदियों पर बाँध बना कर प्राप्त किया जाता है। इनसे पर्यावरण पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। अतः बिजली बचाएँ।
37. आज सौर चूल्हे, जल ऊष्मक, सौर लालटेन आदि जैसे कई गैरपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर आधारित उपकरण उपलब्ध हैं। इन्हें अपनाएँ तथा इनके उपयोग के लिए अन्य लोगों को प्रोत्साहित करें।
38. विकल्प न होने की स्थिति में ही बिजली से चलने वाले उपकरणों को चलाएँ। एल.ई.डी. बल्बों का उपयोग करें।
39. कमरे से बाहर निकलते समय बल्ब और पंखों आदि के स्वीच बंद करें।
40. अगर दिन में स्ट्रीटलाइट जलते हुए देखें तो संबंधित अधिकारियों को सूचित करें।
41. भोजन के दौरान जूठा नहीं छोड़ने का संकल्प लें।
42. अपनी खाने-पीने की आदतों में पश्चिम की देखा देखी करने की बजाय अपने देश-काल पर विचार कर परिवर्तन लाएँ एवं शाकाहार पर जोर दें।
43. अगर हम उद्योगों से जुड़े व्यवसाय से संबंधित हों तो अपने हित पोषण के लिए धरती का असीमित खनन कर भू-क्षरण, जंगलों की मदांध कटाई कर मरुस्थलीकरण को बढ़ाने, जलों में कारखानों के जहरीले पदार्थ फेंक उन्हें प्रदूषित करने, जल-जीवों के अस्तित्व के लिए उन्हें अनुपयुक्त बनाने एवं वायुमंडल में प्रदूषक जहरीली गैस को फैला कर सृष्टि को विनाश की ओर धकेलने से बचें।
44. अगर हम उद्योगों से जुड़े व्यवसाय से संबद्ध हों तो अपनी प्रत्येक गतिविधि के दौरान पर्यावरणी दृष्टि रखें। तत्काल राहत देने वाले समाधानों से बचें जो आगे चल कर नुकसानदायक हों।
45. अपने कार्बन फुटप्रिंट (पद-चिह्न) को हल्का करें। जितना अधिक हम ‘ग्रीन’ (पर्यावरण प्रेमी) रह सकते हों, रहें। समय का अभाव न हो तथा शरीर साथ दे तो पैदल चलें, सायकिल चलाएँ, लेकिन स्कूटर और कार का इस्तेमाल तभी करें जब यह सुनिश्चित हो कि इसके बिना काम चलने वाला नहीं है। संभव हो तो अकेले चलने की बजाए कार पूल (साझा) करें या सार्वजनिक परिवहन के साधनों का इस्तेमाल करें।
46. अपनी जीवन शैली को ईको फ्रेंडली बनाएँ। याद रखें कि हमारी पारम्परिक जीवन शैली कार्बन फुटप्रिंट को हल्का रखने में बहुत कारगर सिद्ध होती है।
47. सरकारी स्तर पर ही रहे विकास कार्यों की पर्यावरणी दृष्टि से मॉनीटरिंग करें।
48. समाज में जागरूकता अभियान चलाएँ ताकि समाज वैज्ञानिक मिजाज वाले विवेकी लोगों से भर जाए। समाज में ऐसे लोग हों जिनमें लोक कल्याण की दिली भावना हो और वे जीवन मूल्यों की कद्र करें। वे उस तकनीकी प्रगत्ति और तरीकों का विरोध करें जो हमारे अस्तित्व को संकट में डालने वाले हों। समाज में ऐसे लोग हों जिनमें अच्छे और बुरे में भेद करने की मता हो। जो अच्छे के पक्ष में खड़े होकर वर्तमान चुनौतियों से जूझने के लिए आगे आएँ।
49. अगर हम मीडिया से जुड़े हैं तो स्थानीय स्तर पर जन्म ले रही पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषित होने से बचाने वाली प्रेरक कहानियों को प्रकाश में लाएँ।
50. लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तो करें लेकिन लालच में आ कर अनावश्यक संग्रह प्रवृत्ति से बचें।
51. विज्ञापन लोगों में लालच जगाते हैं तथा उपभोक्तावादी संस्कृक्ति को प्रोत्साहित करते हैं। इस तरह बाजार की ताकतों द्वारा रचित भ्रम में डालने वाले जाल से लोगों को बचाएँ और वास्तविकता से परिचित कराएँ।
52. अगर हम उपभोगवादी जीवनशैली को अपनाने में तेजी दिखा रहे हैं, तो इसे थामने के लिए अपनी मानसिकता को बदलने पर ध्यान दें।
53. जब हम पर्यावरण संरक्षण की बात करें तो इस बात का ध्यान रखें कि हमारी कथनी और करनी में फर्क न हो। हम लोगों से जो करने का कहें, वह हम स्वयं भी करें।
54. पर्यावरण के हित में कदम उठाएँ। अपने क्रियाकलापों से ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करें जिनसे लोगों का ध्यान आकृष्ट हो। वे आपके साथ जुड़ना चाहें। अगर कोई आपसे जुड़ने के लिए सम्पर्क करे तो उसे विश्वास में लेते हुए तर्कपूर्ण और मनोवैज्ञानिक तरीकों से अपनी बात कहें। अपने विचारों को कदापि न थोपें। उसे सोचने का अवसर दें। धीरे-धीरे ‘प्रकृति-मित्रों’ का एक प्रभावशाली समूह तैयार करें।

वृक्ष-मित्र
सामान्यतः हम पेड़-पौधों के बारे में सिर्फ आर्थिक लाभ की दृष्टि से ही सोचते हैं। लेकिन इसके कई ऐसे लाभ हैं जिन्हें आर्थिक पैमाने पर मापा नहीं जा सकता है। इनकी जड़ें मिट्टी को बहने से बचाती हैं। पेड़ रोकता है मिट्टी का कटाव, जिससे रुकती है बाढ़ और तबाही। ये पक्षियों तथा बंदर जैसे अन्य जीवों को आश्रय देते हैं। ये कार्बन डायऑक्साइड रूपी जहर को पीते हैं तथा ऑक्सीजन रूपी अमृत को उपलब्ध कराते हैं। कई वृक्ष अपने पत्ते, फलों, छालों और जड़ों में औषधीय तत्वों को समाए रहते हैं। अगर सूक्ष्म दृष्टि से विचार करें तो हम आर्थिक दृष्टि से मिलने वाले विभिन्न लाभों का हिसाब भले ही लगा लें लेकिन मन एवं स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों और मिलने वाली शान्ति का हिसाब नहीं लगा सकते हैं।
पेड़-पौधों का अपना एक रहस्यमय संसार भी है। सन १९७० के आसपास प्रकाशित पुस्तक ‘सीक्रेट लाइफआफ प्लांट्स’ में इस संबंध में बहुत जानकारियाँ दी गई हैं। हाल ही में २०१५ में प्रकाशित ‘दि हिडन लाइफ ऑफ ट्रीज’ में जड़ों तथा फफूँद से बनने वाली ‘वुड-वाइड वेब’ नामक संचार नेटवर्क के अस्तित्व के बारे में बताया है। इसका उपयोग जंगलों में उगे पेड़ अपनी खुशियों का इजहार करने वाले संदेशों को भेजने में करते हैं। खतरा आने पर ये रसायनों को उत्सर्जित कर अपने साथियों तक संदेश पहुँचाते हैं एवं दुश्मन कीटों का आक्रमण होने पर मित्र कीड़ों को आमंत्रित करने के लिए भी करते हैं। इसी नेटवर्क से बड़े पेड़ कमजोर पेड़ों के विकास के लिए पोषक तत्त्व उपलब्ध कराते हैं। यह भी देखा गया है कि जब किसी बड़े पेड़ को काट दिया जाता है और जड़ों के साथ सिर्फ दूँठ ही रह जाता है, जिसमें अपना भोजन बनाने की क्षमत्ता नहीं रहती, तब परिवार के अन्य सदस्य ‘वुड वाइड वेब’ के माध्यम से भोजन उपलब्ध करा कर उसे जीवित रखने में मदद करते हैं। ये खोजें हमारी आँखें खोलने तथा वृक्षों के प्रति हमारे बेरुखे व्यवहार को बदलने के लिए मजबूर करने वाली हैं।
इस तरह हमारे जीवन में वृक्षों का आर्थिक ही नहीं, कई और दृष्टियों से नितांत महत्व है। इनकी रक्षा करना स्वयं हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी ही नहीं, अपरिहार्य है। अगर विचार करें तो हम अपने-अपने स्तर पर तथा अपनी अपनी क्षमता के अनुसार वृक्षों को बचाने और उनके संरक्षण के लिए वृक्ष-मित्र बनते हुए अपने लिए एक आचार संहिता तैयार कर निम्नलिखित ठोस कदम उठा सकते हैं।
1. वृक्षों के प्रति अपनी स्वार्थी आर्थिक दृष्टि और व्यावसायिक सोच को बदलें।
2. अवकाश के क्षणों में आसपास के पेड़ों के स्थानीय नाम, उनके गुण आदि से परिचित हों। इस जानकारी को अपने और आस-पड़ोस के बच्चों के साथ बाँटें। बचपन का समय प्रकृति से परिचित कराने का सर्वश्रेष्ठ समय होता है। इस समय बच्चों का मन पवित्र होता है तथा स्वार्थ से परे होता है।
3. पेड़ पौधों की रक्षा करने के साथ उन्हें स्वयं उगाएँ तथा पालें भी।
4. अगर घर में बरामदा है या अतिरिक्त जमीन है तो पौधे अवश्य उगाएँ और बच्चों को नियमित पानी देने के लिए कहें। लेकिन, अगर घर में खाली जमीन नहीं है तो छत, टैरेस, बालकनी आदि की ऐसी जगह तलाशें जहाँ ३-४ घंटे धूप आती हो। फिर गमले या अन्य पात्र में पौधों को लगाएँ।
5. अगर आपको किसी सूखे पेड़ को काटना पड़े तो उसकी जगह एक नया पौधा लगाएँ।
6. अपने जन्म दिन पर वृक्षारोपण का संकल्प लें।
7. अपने जीवन में इतने पेड़ अवश्य लगाएँ जितनों से कम से कम उतनी ऑक्सीजन तो पैदा हो ही सके, जितनी हम जिंदा रहने के लिए ग्रहण करते हैं।
8. कागज बनाने के लिए पेड़ों का इस्तेमाल होता है। अतः कागज का किफायती इस्तेमाल करें। कागज के दोनों और लिखें या प्रिंट करें, पेंसिल का उपयोग करते हुए कागज का एकाधिक बार उपयोग करें।
9. पेड़-पौधों के साथ प्यार भरा व्यवहार करें तथा इस बात का संज्ञान लें कि वृक्ष सही मायनों में हमारे दोस्त, संसाधनों के भंडारी और उपचारक हैं।

जल-मित्र
हमारी धरती पर और धरती के अंदर प्रचुर मात्रा में जल उपलब्ध है। लेकिन इसका ९७ प्रतिशत खारे पानी के रूप में समुद्रों में है। शेष ३ प्रतिशत में से २ प्रतिशत पानी हिम नदियों के रूप में है। इस तरह हमारे उपयोग के लिए मात्र एक प्रतिशत पानी ही है। पानी के विभिन्न गुणों से हम परिचित हैं ही।
हमारे देश में जल के बारे में अनुभवजन्य ज्ञान कहावतों, मुहावरों, लोक कथाओं, पहेलियों, धार्मिक रीति-रिवाजों आदि के रूप में उपलब्ध है। लेकिन पिछले दशकों में हुए प्रयोगों से न सिर्फ इस ज्ञान की पुष्टि हुई है वरन हमें इसकी अलौकिक शक्तियों का भी पता चला है। हाल ही में किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों से पता चला है कि जल पर अच्छे और बुरे विचारों का प्रभाव भी पड़ता है। इस तरह हमारा लोक विज्ञान और आधुनिक खोजें हमें जल के प्रति अपने नजरिए में व्यापक बदलाव लाने के लिए प्रेरित करते हैं।
आज पानी के साथ हमारे अविवेकी व्यवहार के कारण भू-तल और भू-गर्भ दोनों में ही उपलब्ध स्वच्छ और मीठे जल की कमी होने लगी है। जनसंख्या वृद्धि के साथ प्रति व्यक्ति इसकी उपलब्धता भी दिन-ब-दिन घटती जा रही है। चूँकि जल के बिना हमारा जीवित रह पाना नामुमकिन है अतः इनकी रक्षा तथा समुचित प्रबंधन करना जरूरी ही नहीं, अपरिहार्य है। अगर विचार करें तो हम अपने-अपने स्तर पर तथा अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार जल को बचाने तथा प्रदूषित होने से बचाने के लिए जल-मित्र बन कर अपने लिए एक आचार संहिता तैयार कर निम्नलिखित ठोस कदम उठा सकते हैं।
1. जल के बारे में अपनी भौतिक दृष्टि में बदलाव लाएँ।
2. अपने माइण्ड सेट को बदलने के साथ ही थोड़े संयम और आत्म अनुशासन की जरूरत महसूस करें।
3. जल के महत्व को समझने के लिए कल्पना करें कि आप तेज गरमी में रेगिस्तान से गुजर रहे हैं और आपको तेज प्यास लगी है।
4. सोचें, आखिर क्यों आज पीने योग्य पानी की कमी हो रही है। क्यों सामाजिक असंतुलन बढ़ रहा है? क्यों जीव जन्तुओं और बनस्पतियों की सैकड़ों प्रजातियाँ या तो विलुप्त हो चुकी हैं या विलुप्त होने की कगार पर हैं? क्यों स्थितियाँ आज बद से बदतर होती जा रही हैं।
5. आने वाले समय में जल संकट और गहराने वाला है। इस बारे में लोगों को जागरूक करें तथा सबका ध्यान रखने वाली जल प्रबंधन तकनीक को अपनाएँ।
6. जल प्रबंधन की ऐसी देशज और वहन करने योग्य सस्ती लेकिन दक्ष तकनीकों को अपनाएँ जिससे प्रचुर साफ और गुणवत्तापूर्ण जल सम्पदा हम अपनी भावी पौड़ियों को विरासत में दे सकें।
7. अगर खेती करते हों तो अपने खेतों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का युक्तियुक्त उपयोग करें ताकि भू-गर्भ में स्थित जल प्रदूषित होने से बच्चा रहे।
8. जल अनुशासन का कड़ाई से पालन करें तथा सबका ध्यान रखते हुए जल की दृष्टि से कम खर्चीली जीवन-शैली को अपनाएँ।
9. वर्षा के दिनों में पानी के बहाव पर चौकस नजर रखते हुए इस जल को एकत्रित करने और जल स्रोतों के निर्माण की पहल करें।
10. अपनी छत से व्यर्थ बह रहे वर्षा जल को जमीन में उतारें। लेकिन जमीन में उतरने वाले जल की शुद्धता का ध्यान रखें। तीन-चार बारिश के बाद गिरने वाला जल शुद्ध माना जाता है।
11. बारिश के पानी को व्यर्थ बहने से बचाने के लिए जल संग्रहण के लिए तालाब आदि निर्माण हेतु जन भागीदारी को प्रोत्साहित करें।
12. अगर सार्वजनिक स्थलों पर पानी की बरबादी दिखाई दे रही हो तो उसे रोकें। लेकिन अगर उसे रोकना स्वयं अपने बस में न हो तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों/कर्मचारियों को सूचित करें।
13. अपने वाहनों को धोने तथा सिंचाई के लिए ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करें जिसमें पानी की फिजूलखर्ची न हो।
14. घर में दैनिक उपयोग और पीने के पानी को संग्रहीत करने के लिए मिट्टी से बनी मटकियों का उपयोग करें।
15. जल संग्रहण और जंगल के लिए चिह्नित सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को रोकें।
16. बाढ़ के कहर से बचने के लिए अधोसंरचना (जल निकासी, गटर, नदी-नालों पर बाँध आदि) के नियमित रखरखाव की मॉनीटरिंग करें।
17. जल से जुड़े समस्त संस्कारों को जल की महत्ता को स्थापित करने, स्वच्छता को संसार में डालने की प्रक्रिया, मैल, गंदगी, कीटाणु आदि से बचाव का नीरोग जीवन-शैली अपनाएँ।
18. ठहरे हुए जल में मच्छर पनपते हैं जिनसे डेंगू और मलेरिया होता है। इस बात का अपने घरों में ध्यान रखें। यह जानकारी लोगों तक पहुँचाएँ।
19. प्रदूषित जल पीने से दमा, ब्रोमकाइटिस, सिर दर्द, फैफड़े के कैंसर तथा आँख के रोग पैदा होते हैं। यह जानकारी लोगों तक पहुँचाएँ। उन्हें जागरूक करें।
20. जल की कमी (डिहाइड्रेशन) के कारण शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के बारे में लोगों को बताएँ।
21. भोजन करने के पहले और बाद में हाथ धोएँ।
22. उपयोग के पूर्व साफ पानी से बर्तनों को धोएँ।
23. बीमार होने पर उबला पानी पिएँ।
24. पानी में नीम के पत्तों को डाल कर उबालें। फिर उस गरम जल से स्नान करें।
25. पानी को लेकर अपनी सूक्ष्म दृष्टि विकसित करें। पानी पर
भावनाओं का प्रभाव भी पड़ता है। पानी के प्रति संवेदनशील व्यवहार रखें।
26. जल का महत्व समझें तथा अपने जल फुट प्रिंट (पद-चिह्न) को हल्का करें।
27. जो वस्तुएँ हमारे घर तक पहुँचती हैं उनके निर्माण की प्रक्रियाएँ जल की बहुत प्यासी होती हैं। अतः अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने में लगे पदार्थों का युक्तिसंगत और विवेकपूर्ण उपयोग करें। जल को बचाने में योगदान करें।
28. हमारी आदतों के कारण कई गुना पानी व्यर्थ बह जाता है। अतः अपनी उन आदतों को बदलें जिनसे पानी की बरबादी होती है।
29. उपयोग के दौरान पानी की मितव्ययता पर ध्यान दें।
30. आधा गिलास पानी को आवश्यकता हो तो आधा गिलास पानी ही लें।
31. जितने पानी से आप नहाते हैं, उसमें कुछ कमी करते चलें।
32. फव्वारे से नहाने की बजाए गिलास, बाल्टी का उपयोग करें।
33. टायलेट को साफ करने के लिए कम पानी का उपयोग करें।
34. नहाने या किचन में उपयोग के दौरान बेकार हो रहे पानी का उपयोग अपने किचन गार्डन की सिंचाई में करें।
35. नलों से बूंद-बूंद टपकने पर भी दिन भर में बहुत पानी व्यर्थ बह जाता है। नलों को बिना देरी ठीक कराएँ।
36. दाँत साफ करते समय या हाथ धोते समय या शेव करते समय नल को बंद करें या बहुत कम खोलें ताकि जल बच सके। अलग गिलास में जल लेकर इन क्रियाओं को करें।
37. घर में बच्चे हैं तो उनको जल के महत्व के बारे में बताएँ तथा स्वयं मितव्ययी रहते हुए उन्हें भी मितव्ययी बनाएँ।
38. दैनिक उपयोग के लिए जल संग्रहण के लिए मिट्टी से बनी मटकी का उपयोग करें।
39. वर्षा के पहले नदियों की सफाई के लिए अभियान चलाएँ तथा स्थानीय शासी निकायों को जगाएँ।
40. प्लास्टिक की थैलियों में पूजा सामग्री भर कर नदियों, तालाबों, झीलों या पोखरों में न फेंके। नदियों के जल को प्रदूषित होने से बचाएँ। त्यौहारों के दौरान स्थापित मूर्तियों का नदियों में विसर्जन न करें।

वायु-मित्र
आज वायु की संरचना बुरी तरह से गड़बड़ा गई है। कोयले के जलने से कार्बन कण, धुंआ, कार्बन और सल्फर आक्साइड की वृद्धि से जीना दूभर हो रहा है। कुछ जहरीले अपशिष्ट भी हवा-पानी में घुले मिल रहे हैं। कैंसर पैदा करने वाले तत्व भी हवा में शामिल हो गए हैं। ठंड के दिनों में वातावरण घने कोहरे से बैंक जाता है, जो भीषण दुर्घटनाओं का कारण बनता है। बारिश के दिनों में जल को नहीं ‘तेजाब’ की वर्षा हो रही है। कई झीलें जल-जोवों के लिए ‘कब्रगाह’ बन रही हैं। कम होते जा रहे कार्बन-सिंक (पेड़-पौधे) से कार्बन डाय आक्साइड और मिथेन जैसी ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि हो रही है जिससे ‘ग्लोबल वार्मिंग’ और ‘जलवायु परिवर्तन’ का खतरा मंडराने लगा है। अतः हमारे लिए वायु की गुणवत्ता बनाए रखना जरूरी ही नहीं अनिवार्य है। अगर विचार करें तो हम अपने-अपने स्तर पर वायु को प्रदूषित होने से बचाने के लिए वायु-मित्र बनते हुए अपने पालन हेतु एक आचार संहिता तैयार कर निम्नलिखित ठोस कदम उठा सकते हैं।
1. हवा के महत्व से परिचित होने के लिए कल्पना करें कि हम दमघोटू वातावरण से गुजर रहे हैं। ऐसी जगहों से जहाँ चिमनियों से धुंआ निकलता हो और हवा को इतना प्रदूषित कर रहा हो कि जहाँ-तहाँ साँस लेना भी दूभर हो रहा हो।
2. अमेरिका जैसे विकसित देशों की गतिविधियाँ कार्बन डायआक्साइड में तेजी से वृद्धि करती हैं, जबकि भारत जैसे विकासशील कृषि प्रधान देश ‘मिथेन’ को। ‘मिथेन’ पशुओं और उनके गोबर और मूत्र से बनने वाले खादों, धान की खेती, कोयला खदानों, भराव क्षेत्र (लैंडफिल्स) और बाँध क्षेत्रों में वनस्पतियों के डूबने और सड़ने से उत्पन्न होती है। ऐसे में हम अपनी जीवन शैली में परिवर्तन लाकर बहुत कुछ कर सकते हैं।
3. अगर खेती कर रहे हैं तो फसल काटने के बाद बचे हुए डंठलों को न जलाएँ।
4. धूम्रपान न करें और जो कर रहे हों, उन्हें प्यार से समझाएँ।
5. खुले में शौच न करें और लोगों को जागरूक करें।
6. बचे-खुचे खाद्य पदार्थों को यहाँ-वहाँ न फेंके ताकि उनके सड़ने से वायु को प्रदूषित होने से बचाया जा सके।
7. अगर आप कोई उद्योग चला रहे हों तो चिमनी से कार्बनयुक्त धुँआ वातावरण में न छोड़ें।
8. अगर आपको छींक या खाँसी आ रही हो तो नाक और मुँह को कपड़े से ढकें ताकि कीटाणु या जीवाणु हवा में प्रवेश न कर सकें।
9. किचन में चूल्हे के बर्नर से नीली ली ही निकले। अगर पीली ली निकल रही हो तो बर्नर को साफ करें। पीली लौ का मतलब ईंधन का पूर्ण दहन न होना होता है।
10. धूल और मिट्टी या अन्य प्रदूषक कणों को घर के अंदर की हवा में घटाने के लिए घर के बाहर की ओर ऊर्ध्वाधर स्टैण्ड बना कर पौधे लगाएँ।
11. अपने परिवेश में कुत्ता, बिल्ली, चूहा आदि कोई जानवर मर जाए तो पंचायत, नगर पंचायत जैसी जिम्मेदार संस्था को सूचित करें। अगर संभव हो तो स्वयं मरे हुए जानवरों को दफन करें ताकि उनकी सड़ांध हवा को प्रदूषित न कर पाए।
12. कम दूरी तक चलने के लिए ऐसे वाहनों का प्रयोग करें जो हवा को प्रदूषित न करते हों।
13. पैदल चलें, सायकिल चलाएँ, लेकिन स्कूटर और कार का इस्तेमाल तभी करें जब यह सुनिश्चित हो कि इसके बिना काम चलने वाला नहीं। संभव हो तो कार पूल करें। अपने वाहन के टायर की नियमित हवा चेक कराएँ और उसकी नियमित सर्विसिंग पर ध्यान दें।
14. पेट्रोल, डीजल आदि से चलने वाले वाहनों की नियमित जाँच कराएँ।
15. जहाँ तक संभव हो, यात्राओं को टालें और ‘टेली सम्पर्क’ में वृद्धि करें।
16. अगर कहीं ३० सेकण्ड से अधिक समय के लिए रुकना हो तो कार/स्कूटर का इंजन बंद कर दें।
17. पेट्रोल, अल्कोहल, स्प्रे आदि जल्दी वाष्पीकृत होते हैं। अतः इस बात का ध्यान रखें कि ये लीक न हों और इनका रिसाव हवा को प्रदूषित न करे।
18. हमारे देश में होली और दीपावली ऐसे प्रमुख त्यौहार हैं जिन्हें मनाने के तरीके हवा की सेहत को कुछ अधिक ही बिगाड़ते हैं। उत्सवों के दौरान खुशियों को इजहार करने के तरीके सिर्फ दिखावटी न हों। ये ईको मित्रता और आत्मीयता से भरे हों।
19. याद रखें तथा सबको बताएँ कि साँस, पेट, किडनी, लीवर, हृदय आदि से जुड़ी बीमारियाँ लगातार शुद्ध हवा’ के अभाव में होती हैं। मृदा-मित्र मिट्टी की ऊपरी परत जिसमें केंचुए, बैक्टेरिया, फफूँद और अन्य सूक्ष्म जीव निवास करते हैं, इसी मिट्टी से वनस्पति जगत तैयार होता

मृदा-मित्र
मिट्टी की ऊपरी परत जिसमें केंचुए, बैक्टेरिया, फफूँद और अन्य सूक्ष्म जीव निवास करते हैं, इसी मिट्टी से वनस्पति जगत तैयार होता है। मिट्टी के अभाव में जमीन रेगिस्तान बन जाती है। मिट्टी से ही खेत बनते हैं और खेती से ही हमें अपने जीवन को चलाने के लिए अनाज, दाल, सब्जी, फल आदि मिलते हैं, जिनके माध्यम से हमें पौष्टिक तत्व मिलते हैं। अतः खेतों से ढेर सारे जीवनोपयोगी पदार्थ मिले, यह हमारी अपेक्षा होती है। लेकिन, मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहे, यह खेतों के दीर्घ और स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी है। अतः मिट्टी और उसकी गुणवत्ता को बचाए रखना हमारे लिए जरूरी और अनिवार्य है। इसके लिए हम अपने-अपने स्तर पर तथा अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार मिट्टी को प्रदूषित होने से बचाने के लिए मृदा-मित्र बनते हुए अपने लिए एक आचार संहिता तैयार कर निम्नलिखित ठोस कदम उठा सकते हैं।
1. आज जरूरी है कि हम खेती के मामले में रासायनिक तरीकों को छोड़ते हुए जैविक तरीके अपनाना शुरू करें।
2. मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए अपने खेतों में वर्मी और कम्पोस्ट खादों का उपयोग करें।
3. मिट्टी को इतना जहरीला न बनाएँ, जो केंचुओं को पनपने ही न दें।
4. मिट्टी क्षरण के कारण हजारों एकड़ जमीन से हाथ धोना पड़ता है। उस मिट्टी से जिसे चट्टान और पत्थरों से बनने में लम्बे समय का इंतजार करना पड़ता है। अतः अगर खेत में से वर्षा का जल बहता हो तो उपयुक्त स्थानों पर अवरोधक लगाएँ ताकि मिट्टी बच सके।
5. पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बहने से रोकती हैं, अतः पेड़ लगाएँ।
6. खेतों की मेड़ों पर पेड़ लगाएँ ताकि फसल कटने के बाद भी प्राकृक्तिक वातावरण बना रहे और पक्षी अपना घोंसला बना सके। कई पक्षी खेती के दुश्मन-कीड़ों को अपना भोजन बनाते हैं।
7. जमीन पर गिरे पत्तों आदि को सड़ने दें। इससे मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ती है और गुणवत्ता बनी रहती है।
8. खाद्य पदार्थों को प्लास्टिक की थैलियों में रख कर न फेंके।
9. गोबर और मूत्र का इस्तेमाल खाद और बायोगैस बनाने में करने हेतु सामुदायिक एवं व्यावसायिक स्तर पर प्रयास करें।
10. अपने घर पर प्लास्टिक कचरे और घरेलू कचरे के लिए अलग-अलग पेटियाँ रखें। हो सके तो घरेलू कचरे से अपने आँगन या छत पर बने किचन गार्डन के लिए खाद बनाएँ।
11. खेतों में हवा के साथ उड़ कर आने वाले प्लास्टिक के कचरे को बीन कर साफ करें।
12. पर्यटन स्थलों और पार्कों में पॉलीथिन की थैलियाँ जहाँ-तहाँ न फेंके। डस्टबिन का उपयोग करें। क्योंकि ये उड़ कर खेतों तक पहुँच जाती हैं और बहुत नुकसान पहुँचाती हैं।
13. बाजार जाते वक्त पॉलीथिन के बजाए कपड़े या जूट से बनी थैलियों का इस्तेमाल करें। सब्जियाँ लेते समय दुकानदार से पॉलीथिन की थैलियाँ लेने से इन्कार करें। पैकेटों में मिल रहे सामान की बजाए खुले में खरीदें।
14. अगर आप खेती कर रहे हैं तो मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए फसल चक्र को अपनाएँ।
15. अगर किसान हैं तो मिट्टी का परीक्षण कराएँ तथा जानें कि खेत में किन-किन तत्वों की कमी है। इसके बाद विशेषज्ञों की सलाह लेकर इन तत्वों को पूर्ति कर अपने खेत के स्वास्थ्य को बेहतर करें। खेत में उचित मात्रा में रासायनिक खादों के साथ ही कम्पोस्ट खाद का भी उपयोग करें।
16. दूसरों की देखा-देखी खती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का आवश्यकता से अधिक प्रयोग न करें। इससे जमीन की उर्वरा शक्ति कमजोर होती है। मिट्टी की जल धारण क्षमता कम होती है तथा भू-जल स्तर में गिरावट आती है।
17. फसल काटने के बाद खेत में डंठल आदि के रूप में जो अवशेष रह जाते हैं उन्हें न जलाएँ। इससे वायु प्रदूषित होती है तथा इससे पैदा होने वाली गर्मी की वजह से खेत के जीवाणु भी मर जाते हैं और जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। अतः इन्हें जलाने की बजाए खेतों में ही मिला दें, ताकि वह सड़ कर जैविक खाद में बदल जाए और जमीन में जीवाश्म कार्बन बढ़ जाए।

अंत में…
आज पर्यावरण को खतरा हमारे लालच और स्वार्थ से भरी गतिविधियों के कारण है। हमारे पास बुद्धि तो है लेकिन विवेक की कमी है। विवेक रहित मनोवृत्ति पर अड़े रहना हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इसे बदलना सबसे बड़ी चुनौती है।
हमें भावी पीढ़ियों के बारे में सोचना है। यह हम प्रकृक्ति-मित्र, वृक्ष-मित्र, जल-मित्र, वायु-मित्र और मृदा मित्र बन कर कर सकते हैं। जरूरत दृढ़ संकल्प लेकर ठोस कदम उठाने की है।

लेखक: उच्च शिक्षा सेवा म. प्र. के
संयुक्त संचालक रह चुके हैं (अब स्व.)

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