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बिना जल स्रोतों के वन प्रबंधन अधूराः

By Depesh Mishra

वन बल प्रमुख बोले- वन और जल प्रबंधन साथ-साथ न हुआ तो नदियां होंगी मौसमी, बढ़ेगा मानव-वन्यजीव द्वंदः
भोपाल, मध्य प्रदेश के वन क्षेत्रों में जल स्रोतों की उपेक्षा को लेकर वन बल प्रमुख वीएन अंबाड़े ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जल स्रोतों के समुचित प्रबंधन के बिना वन क्षेत्र का प्रबंधन अधूरा है। वन और जल प्रबंधन को समानांतर रूप से किया जाना चाहिए, लेकिन वर्तमान में वृक्षारोपण और वन प्रबंधन के दौरान जल प्रबंधन को आवश्यक प्राथमिकता नहीं दी जा रही है।
वन बल प्रमुख का मानना है कि बेहतर जल प्रबंधन से मानव-वन्यजीव द्वंद की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सकता है।

सभी टाइगर रिजर्व और वन अधिकारियों को पत्रः
इस महत्वपूर्ण विषय को लेकर वन बल प्रमुख ने प्रदेश के सभी टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर, उपसंचालक, वन संरक्षक, डीएफओ, साथ ही कार्य आयोजना, सामाजिक वानिकी और वन विकास निगम के क्षेत्रीय प्रबंधकों को पत्र जारी किया है। पत्र में उन्होंने बताया है कि मध्य प्रदेश की लगभग सभी नदियों का उद्गम स्थल वन क्षेत्र ही है, इसलिए वन प्रबंधन के साथ-साथ जंगलों में मौजूद छोटे-बड़े नाले, तालाब, नहर, स्टॉप डैम और अन्य जल स्रोतों का प्रबंधन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।

जल प्रबंधन नहीं हुआ तो नदियों का प्रवाह टूटेगाः
अंबाड़े ने चेतावनी दी है कि यदि जल स्रोतों का सही ढंग से प्रबंधन नहीं किया गया तो –

  • नदियों का निरंतर जल प्रवाह बाधित होगा,
  • बारहमासी नदियां मौसमी बन सकती हैं,
  • कुछ नदियां पहले से ही इस स्थिति के करीब पहुंच चुकी हैं।

उन्होंने कहा कि जल स्रोत अपने आप में एक जलीय इकोसिस्टम हैं, जहां अधिक जैव विविधता पाई जाती है और इसी पर क्षेत्र के समस्त वन्यजीव निर्भर रहते हैं।

विभाग जल स्रोत प्रबंधन को नहीं दे रहा प्राथमिकताः
सितंबर के प्रथम सप्ताह में खजुराहो में आयोजित वेटलैंड मैनेजमेंट कार्यशाला में यह तथ्य सामने आया कि विभाग जल स्रोतों के प्रबंधन को प्राथमिकता से नहीं ले रहा है। प्रदेश के वन, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में-

  • कई प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद हैं,
  • अनेक जल स्रोत विभाग द्वारा कृत्रिम रूप से निर्मित किए गए हैं,
  • ताकि वन्यजीवों को सालभर पानी उपलब्ध कराया जा सके, लेकिन इनका रखरखाव और संरक्षण पर्याप्त नहीं है।

जल संकट ही मानव-वन्यजीव द्वंद की बड़ी वजहः
वन बल प्रमुख के अनुसार, अप्रैल से जून के बीच-

  • कई जल स्रोतों में पानी बहुत कम या पूरी तरह समाप्त हो जाता है,
  • पानी की तलाश में वन्यजीव जंगल से बाहर निकलते हैं,
  • ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों के जल स्रोतों पर निर्भर होते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव द्वंद की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

वन बल प्रमुख के अनुसार, यदि वन क्षेत्रों में मौजूद सभी जल स्रोतों का सही प्रबंधन किया जाए तो-

  • नदियों में पानी का प्रवाह बना रहेगा,
  • वन्यजीवों को वर्षभर जंगल के भीतर पानी मिलेगा,
  • और द्वंद की घटनाओं पर नियंत्रण संभव होगा।

जल स्रोत प्रबंधन के लिए अलग बजट का प्रावधानः
अंबाड़े ने जानकारी दी कि इस समस्या को ध्यान में रखते हुए वित्तीय वर्ष 2026-27 से वन क्षेत्रों में जल स्रोतों के प्रबंधन के लिए अलग बजट उपमद बनाया गया है।

इसके तहत-

  • जल स्रोतों के रखरखाव और विकास के लिए नियमित बजट उपलब्ध रहेगा,
  • कार्य आयोजना,
  • विकास एवं कैम्पा शाखा से भी आवश्यक धनराशि प्राप्त की जा सकेगी।

वन बल प्रमुख का स्पष्ट संदेश है कि जल स्रोतों का संरक्षण केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण, जन जीवन और मानव सुरक्षा से सीधे जुड़ा विषय है। जल और वन का संतुलित प्रबंधन ही सतत वन संरक्षण की कुंजी है।


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